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‼️आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।‼️🦚🌱🍁🍂🌿☘️🌾🦚🚩By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब‼️सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते.⛳🚩‼️देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।⛳‼️बाल वनिता महिला आश्रम🚩🦚🌱🍁🍂🌿☘️🌾🦚🚩 🌹रामचरितमानस में श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं-नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् ।रचि महेस निज मानस राखा ।पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ।1/34/11संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी।रामचरितमानस कवि तुलसी।।1/36/1तो यह भोलेनाथ ने लिखी और उन्हीं का प्रसाद है।🌹रामचरितमानस वेदों श्रुतियों और पुराणों का सार है।गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज रामचरितमानस की आरती में भी लिखते हैं-गावत बेद पुरान अष्टदस।छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस।🌹तो आइए हम उसी विश्वास के साथ इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक है और मानस दुर्गा सप्तशती में मात्र 7 चौपाइयों हैं। इनका विधिवत् विश्वास के साथ पाठ करने से वही फल मिलता है, जो दुर्गा सप्तशती के पाठ से मिलता है।🔱⛳मानस दुर्गा सप्तशती⛳🔱🌿जय जय गिरिबर राजकिशोरी। जय महेश मुख चंद्र चकोरी ।।🌿जय गज बदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।🌿नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाव वेद नहिं जाना।।🌿भव भव विभव पराभव कारिनि। विश्व मोहिनि स्वबस बिहारिनि।।🌿पतिदेवता सुतीय महँ मातु प्रथम तव रेख।महिमा अमित न सकहिं कहि सहस शारदा शेष।🌿सेवत तोहि सुलभ फल चारि। बरदायनि त्रिपुरारि पियारी।।🌿देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳‼️जय माता दी👏🔱⛳‼️‼️प्रभु की कृपा भयउ सब काजू।जन्म हमार सुफल भा आजू।।रामकृपा नासहिं सब रोगा।जो यह भाँति बने संजोगा।।नासे रोग हरै सब पीरा ।जपत निरंतर हनुमत वीरा।।पाहि नाथ मम पाहि गोसाई। यह खल खाइ दुष्ट की नाईं।।जय रघुवंश बनज बन भानू।गहन दनुज कुल दहन कृसानु‼️🔱🌹ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे🌹🔱 🌹या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थित ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः👏 🚩या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥👏बासिन्तक नवरात्रोत्सव की बहुत-बहुत शुभकामनाएं🌹स्वस्थ रहें, स्वच्छ रहें, सावधानी रखें,!सपरिवार सकुशलता का अभिलाषी!!! 🚩🙏नुतन वर्षाभिनंदन🙏🙏आप सबको सपरिवार नववर्ष विक्रम संवत 2078 की बहुत बहुत शुभकामनाएं... *नुतन वर्षाभिनंदन...* 🙏🚩🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🔱माता शारदा देवी की जय🔱 🚩🙏जय माता दी🙏🚩 🚩जय सियाराम🙏🌹🙏 🚩श्री राम जय राम जय जय राम🚩

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‼️आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं, 
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।‼️
🦚🌱🍁🍂🌿☘️🌾🦚
‼️सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते.⛳
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‼️देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।⛳‼️
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    🌹रामचरितमानस में श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं-
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् ।
रचि महेस निज मानस राखा ।
पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ।1/34/11
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी।
रामचरितमानस कवि तुलसी।।1/36/1
तो यह भोलेनाथ ने लिखी और उन्हीं का प्रसाद है।
🌹रामचरितमानस वेदों श्रुतियों और पुराणों का सार है।
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज रामचरितमानस की आरती में भी लिखते हैं-
गावत बेद पुरान अष्टदस।
छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस।
🌹तो आइए हम उसी विश्वास के साथ इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक है और मानस दुर्गा सप्तशती में मात्र 7 चौपाइयों हैं। इनका विधिवत् विश्वास के साथ पाठ करने से वही फल मिलता है, जो दुर्गा सप्तशती के पाठ से मिलता है।

🔱⛳मानस दुर्गा सप्तशती⛳🔱

🌿जय जय गिरिबर राजकिशोरी।
     जय महेश मुख चंद्र चकोरी ।।

🌿जय गज बदन षडानन माता।
     जगत जननि दामिनि दुति गाता।

🌿नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
     अमित प्रभाव वेद नहिं जाना।।

🌿भव भव विभव पराभव कारिनि।
     विश्व मोहिनि स्वबस बिहारिनि।।

🌿पतिदेवता सुतीय महँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस शारदा शेष।

🌿सेवत तोहि सुलभ फल चारि।
     बरदायनि त्रिपुरारि पियारी।।

🌿देबि पूजि पद कमल तुम्हारे।
     सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।

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‼️जय माता दी👏🔱⛳‼️

‼️प्रभु की कृपा भयउ सब काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू।।
रामकृपा नासहिं सब रोगा।
जो यह भाँति बने संजोगा।।
नासे रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत वीरा।।
पाहि नाथ मम पाहि गोसाई। 
यह खल खाइ दुष्ट की नाईं।।
जय रघुवंश बनज बन भानू।
गहन दनुज कुल दहन कृसानु‼️

🔱🌹ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे🌹🔱   

🌹या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थित ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः👏 

🚩या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥👏

बासिन्तक नवरात्रोत्सव की बहुत-बहुत शुभकामनाएं🌹

स्वस्थ रहें, स्वच्छ रहें, सावधानी रखें,!
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🔱माता शारदा देवी की जय🔱

   🚩🙏जय माता दी🙏🚩
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"महाराज कर सुभ अभिषेका | सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका || सुर दुर्लभ सुख करि जग माही | अंतकाल रघुपति पुर जाही ||"* ( महाराज #श्रीरामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र 'निष्कामभाव से' सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं |समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब वे जगत में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में #श्रीरामजी के परमधाम को जाते हैं | )***

"महाराज कर सुभ अभिषेका |  सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ||  सुर दुर्लभ सुख करि जग माही |  अंतकाल रघुपति पुर जाही ||" By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब *      ( महाराज #श्रीरामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र 'निष्कामभाव से' सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं | वे जगत में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में #श्रीरामजी के परमधाम को जाते हैं | ) ***

❁══❁❁═ ══❁❁══❁❁ राधे माला किर्तन पोस्ट ❁❁══❁❁═ ══❁❁══❁हे कृष्ण🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏सुना है , आँखों मे तेरी , प्रेम समन्दर बसते हैं । फिर भी हम, एक बून्द , पानी को तरसते हैं ।🌹मिटा दो , जन्मों जन्मों की प्यास , साँवरे। 💐🪻प्रेम उत्सव मे बीत जाये , जीवन डगर प्यारे।🌹🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।भक्तो की तुमने विपदा टारी मुझे भी आके थाम मुरलीवाले।।🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷विघ्न बनाये तुमने, कर पार मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸पतझड़ है मेरा जीवन, बन के बहार आजा।सुन ले पुकार कान्हा, बस एक बार आजा।बैचैन मन के तुम ही, आराम मुरली वाले॥💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥तुम हो दया के सागर, जनमों की मैं हूँ प्यासी।दे दो जगह मुझे भी, चरणों में बस ज़रा सी।सुबह तुम ही हो, तुम ही, मेरी शाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿रूप सलोना देख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई,कमली श्याम दी कमली,कमली श्याम दी कमली।।🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻सखी पनघट पर यमुना के तट पर,लेकर पहुंची मटकी,भूल गई सब एक बार जब,छवि देखि नटखट की,देखत ही मैं हुई बाँवरी,उसी रूप में खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁कदम के नीचे अखियाँ मीचे,खड़ा था नन्द का लाला,मुख पर हंसी हाथ में बंसी,मोर मुकुट गल माला,तान सुरीली मधुर नशीली,तन मन दियो भिगोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹सास ननन्द मोहे पल-पल कोसे,हर कोई देवे ताने,बीत रही क्या मुझ बिरहन पर,ये कोई नहीं जाने,पूछे सब निर्दोष बावरी,तट पर काहे गई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺रूप सलोना देख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई,कमली श्याम दी कमली,कमली श्याम दी कमली।।#Vnitaराधे राधे 🌲🙏🌲🙏🌲🙏🌲🙏🌲#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #टीम #द्वारका जी जाते हुए ◢█◈★◈■⚀■◈★◈█◣GOOD MORNING DOS ⫷▓▓▓(✴ ✴)▓▓▓ ◥█◈★◈■⚀■◈★◈ ██ ◥◤★ 💕कुछ गहरा सा लिखना था___❦︎ इश्क से ज्यादा क्या लिखूं,❦︎❣︎_____सुनो अब #जिंदगी _लिखनी है___ #तुमसे_ज्यादा क्या लिखूं..!! 🍒🌷 नस_नस मे #नशा है ते हर #सांस को तेरी ही #तलब है, ऐसे मे 🥰 अब दूर कैसे रहूँ #तुझसे तू ही #इश्क मेरा, 🥰तू ही #मोहब्बत है।❣️💞तोड़ दूँ.....सारी 🥰 “बंदिशें और 😘 तुझसे लिपट......जाऊं..!❣️💞💖सुन.....लूँ तेरी “धड़कन“🥰 और....तेरी 😘बाहों में सिमट जाऊं..!💞💞❣️छू लूँ🥰 मेरे “सांसो“ से..... तेरे “सांसो तेरी...... हर सांस में घुल 😘जाऊं..!💞 💞💖तेरे 🥰 "दिल" में... उतर कर, तेरी.... "रूह" से मिल 😘जाऊं..!!💞 #Vnita 🖤♦️━━•❣️•✮✮┼ ◢ ▇ ◣ ♥️ ◢ ▇ ▇ ▇ ▇ ◣ ◢ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ▇ ▇ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ◥ ╔══❤️═ ♥️ #कान्हा ╚══❤️═राधे रादेधे═╝♥️═╗ ◤ ◤ ◤ ◤ ▇ ◣┼✮┼✮━━♦️💖🖤💖 ❣️“ को,💖 को,💞“💖 मै,💖रा 💖🍒🌷💖❣︎◥◤◥◤ ██████◤⫸ TO

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दर्शनशास्त्र के अनुसारभारतीय आस्तिक दर्शनशास्त्र के मत में शब्द के नित्य होने से उसका अर्थ के साथ स्वयम्भू-जैसा सम्बन्ध होता है। वेद में शब्द को नित्य समझने पर वेद को अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) माना गया है। निरूक्तकार भी इसका प्रतिपादन करते हैं। आस्तिक दर्शन ने शब्द को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण मान्य किया है। इस विषय में मीमांसा- दर्शन तथा न्याय-दर्शन के मत भिन्न-भिन्न हैं। जैमिनीय मीमांसक, कुमारिल आदि मीमांसक, आधुनिक मीमांसक तथा सांख्यवादियों के मत में वेद अपौरुषेय, नित्य एवं स्वत:प्रमाण हैं। मीमांसक वेद को स्वयम्भू मानते हैं। उनका कहना है कि वेद की निर्मिति का प्रयत्न किसी व्यक्ति-विशेष का अथवा ईश्वर का नहीं है। नैयायिक ऐसा समझते हैं कि वेद तो ईश्वरप्रोक्त है। मीमांसक कहते हैं कि भ्रम, प्रमाद, दुराग्रह इत्यादि दोषयुक्त होने के कारण मनुष्य के द्वारा वेद-जैसे निर्दोष महान ग्रन्थरत्न की रचना शक्य ही नहीं है। अत: वेद अपौरुषेय ही है। इससे आगे जाकर नैयायिक ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर ने जैसे सृष्टि की, वैसे ही वेद का निर्माण किया; ऐसा मानना उचित ही है।श्रुति के मतानुसार वेद तो महाभूतों का नि:श्वास (यस्य नि:श्वतिसं वेदा...) है। श्वास-प्रश्वास स्वत: आविर्भूत होते हैं, अत: उनके लिये मनुष्य के प्रयत्न की अथवा बुद्धि की अपेक्षा नहीं होती। उस महाभूत का नि:श्वासरूप वेद तो अदृष्टवशात अबुद्धिपूर्वक स्वयं आविर्भूत होता है।वेद नित्य-शब्द की संहृति होने से नित्य है और किसी भी प्रकार से उत्पाद्य नहीं है; अत: स्वत: आविर्भूत वेद किसी भी पुरुष से रचा हुआ न होने के कारण अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) सिद्ध होता है। इन सभी विचारों को दर्शन शास्त्र में अपौरुषेयवाद कहा गया है।अवैदिक दर्शन को नास्तिक दर्शन भी कहते हैं, क्योंकि वह वेद को प्रमाण नहीं मानता, अपौरुषेय स्वीकार नहीं करता। उसका कहना है कि इहलोक (जगत) ही आत्मा का क्रीडास्थल है, परलोक (स्वर्ग) नाम की कोई वस्तु नहीं है, 'काम एवैक: पुरुषार्थ:'- काम ही मानव-जीवन का एकमात्र पुरुषार्थ होता है, 'मरणमेवापवर्ग:'- मरण (मृत्यु) माने ही मोक्ष (मुक्ति) है, 'प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्'- जो प्रत्यक्ष है वही प्रमाण है (अनुमान प्रमाण नहीं है)। धर्म ही नहीं है, अत: अधर्म नहीं है; स्वर्ग-नरक नहीं हैं। 'न परमेश्वरोऽपि कश्चित्'- परमेश्वर –जैसा भी कोई नहीं है, 'न धर्म: न मोक्ष:'- न तो धर्म है न मोक्ष है। अत: जब तक शरीर में प्राण है, तब तक सुख प्राप्त करते हैं- इस विषय में नास्तिक चार्वाक-दर्शन स्पष्ट कहता है-यावज्जीवं सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिबेत्।भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:॥[17]चार्वाक-दर्शन शब्द में 'चर्व' का अर्थ है-खाना। इस 'चर्व' पद से ही 'खाने-पीने और मौज' करने का संदेश देने वाले इस दर्शन का नाम 'चार्वाक-दर्शन' पड़ा है। 'गुणरत्न' ने इसकी व्याख्या इस प्रकार से की है- परमेश्वर, वेद, पुण्य-पाप, स्वर्ग-नरक, आत्मा, मुक्ति इत्यादि का जिसने 'चर्वण' (नामशेष) कर दिया है, वह 'चार्वाक-दर्शन' है। इस मत के लोगों का लक्ष्य स्वमतस्थापन की अपेक्षा परमतखण्डन के प्रति अधिक रहने से उनको 'वैतंडिक' कहा गया है। वे लोग वेदप्रामाण्य मानते ही नहीं।1.जगत,2.जीव,3.ईश्वर और4.मोक्ष- ये ही चार प्रमुख प्रतिपाद्य विषय सभी दर्शनों के होते हैं।आचार्य श्रीहरिभद्र ने 'षड्दर्शन-समुच्चय' नाम का अपने ग्रन्थ में1.न्याय,2.वैशेषिक,3.सांख्य,4.योग,5.मीमांसा और6.वेदान्त- इन छ: को वैदिक दर्शन (आस्तिक-दर्शन) तथा7.चार्वाक,8.बौद्ध और9.जैन-इन तीन को 'अवैदिक दर्शन' (नास्तिक-दर्शन) कहा है और उन सब पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया है। वेद को प्रमाण मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक हैं, इस दृष्टि से उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि षड्दर्शन को आस्तिक और चार्वाकादि दर्शन को नास्तिक कहा गया है।मनु स्मृति में वेद ही By वनिता कासनियां पंजाबमनुस्मृति कहती है- 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेय:'[6] 'आदिसृष्टिमारभ्याद्यपर्यन्तं ब्रह्मादिभि: सर्वा: सत्यविद्या: श्रूयन्ते सा श्रुति:॥'[7] वेदकालीन महातपा सत्पुरुषों ने समाधि में जो महाज्ञान प्राप्त किया और जिसे जगत के आध्यात्मिक अभ्युदय के लिये प्रकट भी किया, उस महाज्ञान को 'श्रुति' कहते हैं।श्रुति के दो विभाग हैं-1.वैदिक और2.तान्त्रिक- 'श्रुतिश्च द्विविधा वैदिकी तान्त्रिकी च।'मुख्य तन्त्र तीन माने गये हैं-1.महानिर्वाण-तन्त्र,2.नारदपाञ्चरात्र-तन्त्र और3.कुलार्णव-तन्त्र।वेद के भी दो विभाग हैं-1.मन्त्र विभाग और2.ब्राह्मण विभाग- 'वेदो हि मन्त्रब्राह्मणभेदेन द्विविध:।'वेद के मन्त्र विभाग को संहिता भी कहते हैं। संहितापरक विवेचन को 'आरण्यक' एवं संहितापरक भाष्य को 'ब्राह्मणग्रन्थ' कहते हैं। वेदों के ब्राह्मणविभाग में' आरण्यक' और 'उपनिषद'- का भी समावेश है। ब्राह्मणविभाग में 'आरण्यक' और 'उपनिषद'- का भी समावेश है। ब्राह्मणग्रन्थों की संख्या 13 है, जैसे ऋग्वेद के 2, यजुर्वेद के 2, सामवेद के 8 और अथर्ववेद के 1 ।मुख्य ब्राह्मणग्रन्थ पाँच हैं-ऋग्वेद का आवरण1.ऐतरेय ब्राह्मण,2.तैत्तिरीय ब्राह्मण,3.तलवकार ब्राह्मण,4.शतपथ ब्राह्मण और5.ताण्डय ब्राह्मण।उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गये हैं, जैसे-1.ईश,2.केन,3.कठ,4.प्रश्न,5.मुण्डक,6.माण्डूक्य,7.तैत्तिरीय,8.ऐतरेय,9.छान्दोग्य,10.बृहदारण्यक,11.कौषीतकि और12.श्वेताश्वतर। दर्शन शास्त्र के अनुसारभारतीय आस्तिक दर्शनशास्त्र के मत में शब्द के नित्य होने से उसका अर्थ के साथ स्वयम्भू-जैसा सम्बन्ध होता है। वेद में शब्द को नित्य समझने पर वेद को अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) माना गया है। निरूक्तकार भी इसका प्रतिपादन करते हैं। आस्तिक दर्शन ने शब्द को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण मान्य किया है। इस विषय में मीमांसा- दर्शन तथा न्याय-दर्शन के मत भिन्न-भिन्न हैं। जैमिनीय मीमांसक, कुमारिल आदि मीमांसक, आधुनिक मीमांसक तथा सांख्यवादियों के मत में वेद अपौरुषेय, नित्य एवं स्वत:प्रमाण हैं। मीमांसक वेद को स्वयम्भू मानते हैं। उनका कहना है कि वेद की निर्मिति का प्रयत्न किसी व्यक्ति-विशेष का अथवा ईश्वर का नहीं है। नैयायिक ऐसा समझते हैं कि वेद तो ईश्वरप्रोक्त है। मीमांसक कहते हैं कि भ्रम, प्रमाद, दुराग्रह इत्यादि दोषयुक्त होने के कारण मनुष्य के द्वारा वेद-जैसे निर्दोष महान ग्रन्थरत्न की रचना शक्य ही नहीं है। अत: वेद अपौरुषेय ही है। इससे आगे जाकर नैयायिक ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर ने जैसे सृष्टि की, वैसे ही वेद का निर्माण किया; ऐसा मानना उचित ही है।श्रुति के मतानुसार वेद तो महाभूतों का नि:श्वास (यस्य नि:श्वतिसं वेदा...) है। श्वास-प्रश्वास स्वत: आविर्भूत होते हैं, अत: उनके लिये मनुष्य के प्रयत्न की अथवा बुद्धि की अपेक्षा नहीं होती। उस महाभूत का नि:श्वासरूप वेद तो अदृष्टवशात अबुद्धिपूर्वक स्वयं आविर्भूत होता है।वेद नित्य-शब्द की संहृति होने से नित्य है और किसी भी प्रकार से उत्पाद्य नहीं है; अत: स्वत: आविर्भूत वेद किसी भी पुरुष से रचा हुआ न होने के कारण अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) सिद्ध होता है। इन सभी विचारों को दर्शन शास्त्र में अपौरुषेयवाद कहा गया है।अवैदिक दर्शन को नास्तिक दर्शन भी कहते हैं, क्योंकि वह वेद को प्रमाण नहीं मानता, अपौरुषेय स्वीकार नहीं करता। उसका कहना है कि इहलोक (जगत) ही आत्मा का क्रीडास्थल है, परलोक (स्वर्ग) नाम की कोई वस्तु नहीं है, 'काम एवैक: पुरुषार्थ:'- काम ही मानव-जीवन का एकमात्र पुरुषार्थ होता है, 'मरणमेवापवर्ग:'- मरण (मृत्यु) माने ही मोक्ष (मुक्ति) है, 'प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्'- जो प्रत्यक्ष है वही प्रमाण है (अनुमान प्रमाण नहीं है)। धर्म ही नहीं है, अत: अधर्म नहीं है; स्वर्ग-नरक नहीं हैं। 'न परमेश्वरोऽपि कश्चित्'- परमेश्वर –जैसा भी कोई नहीं है, 'न धर्म: न मोक्ष:'- न तो धर्म है न मोक्ष है। अत: जब तक शरीर में प्राण है, तब तक सुख प्राप्त करते हैं- इस विषय में नास्तिक चार्वाक-दर्शन स्पष्ट कहता है-यावज्जीवं सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिबेत्।भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:॥[17]चार्वाक-दर्शन शब्द में 'चर्व' का अर्थ है-खाना। इस 'चर्व' पद से ही 'खाने-पीने और मौज' करने का संदेश देने वाले इस दर्शन का नाम 'चार्वाक-दर्शन' पड़ा है। 'गुणरत्न' ने इसकी व्याख्या इस प्रकार से की है- परमेश्वर, वेद, पुण्य-पाप, स्वर्ग-नरक, आत्मा, मुक्ति इत्यादि का जिसने 'चर्वण' (नामशेष) कर दिया है, वह 'चार्वाक-दर्शन' है। इस मत के लोगों का लक्ष्य स्वमतस्थापन की अपेक्षा परमतखण्डन के प्रति अधिक रहने से उनको 'वैतंडिक' कहा गया है। वे लोग वेदप्रामाण्य मानते ही नहीं।1.जगत,2.जीव,3.ईश्वर और4.मोक्ष- ये ही चार प्रमुख प्रतिपाद्य विषय सभी दर्शनों के होते हैं।आचार्य श्रीहरिभद्र ने 'षड्दर्शन-समुच्चय' नाम का अपने ग्रन्थ में1.न्याय,2.वैशेषिक,3.सांख्य,4.योग,5.मीमांसा और6.वेदान्त- इन छ: को वैदिक दर्शन (आस्तिक-दर्शन) तथा7.चार्वाक,8.बौद्ध और9.जैन-इन तीन को 'अवैदिक दर्शन' (नास्तिक-दर्शन) कहा है और उन सब पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया है। वेद को प्रमाण मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक हैं, इस दृष्टि से उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि षड्दर्शन को आस्तिक और चार्वाकादि दर्शन को नास्तिक कहा गया है।By वनिता कासनियां पंजाब

दर्शनशास्त्र के अनुसार भारतीय आस्तिक दर्शनशास्त्र के मत में शब्द के नित्य होने से उसका अर्थ के साथ स्वयम्भू-जैसा सम्बन्ध होता है। वेद में शब्द को नित्य समझने पर वेद को अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) माना गया है। निरूक्तकार भी इसका प्रतिपादन करते हैं। आस्तिक दर्शन ने शब्द को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण मान्य किया है। इस विषय में मीमांसा- दर्शन तथा न्याय-दर्शन के मत भिन्न-भिन्न हैं। जैमिनीय मीमांसक, कुमारिल आदि मीमांसक, आधुनिक मीमांसक तथा सांख्यवादियों के मत में वेद अपौरुषेय, नित्य एवं स्वत:प्रमाण हैं। मीमांसक वेद को स्वयम्भू मानते हैं। उनका कहना है कि वेद की निर्मिति का प्रयत्न किसी व्यक्ति-विशेष का अथवा ईश्वर का नहीं है। नैयायिक ऐसा समझते हैं कि वेद तो ईश्वरप्रोक्त है। मीमांसक कहते हैं कि भ्रम, प्रमाद, दुराग्रह इत्यादि दोषयुक्त होने के कारण मनुष्य के द्वारा वेद-जैसे निर्दोष महान ग्रन्थरत्न की रचना शक्य ही नहीं है। अत: वेद अपौरुषेय ही है। इससे आगे जाकर नैयायिक ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर ने जैसे सृष्टि की, वैसे ही वेद का निर्माण किया; ऐसा मानना उचित ही है। श्रुति के मतानुसार वेद तो महाभूतों का नि:श्...