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जय श्री लक्ष्मी मां

. आगामी दिनांक 06.06.2021 दिन रविवार को आनेवाली है, ज्येष्ठ माह के कृष्णपक्ष की एकादशी👇

                             “अपरा एकादशी"

           ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा है। अपरा अर्थात अपार या अतिरिक्त, जो प्राणी एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें भगवान श्रीहरि विष्णु की अतिरिक्त भक्ति प्राप्त होती है। भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि होती है। एकादशी व्रत का संबंध केवल पाप मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति से नहीं है। एकादशी व्रत भौतिक सुख और धन देने वाली भी मानी जाती है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी ऐसी ही एकादशी है जिस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने से अपार धन प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु व उनके पांचवें अवतार वामन ऋषि की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी व्रत के प्रभाव से अपार खुशियों की प्राप्ति तथा पापों का नाश होता है।

                                     महत्व

           यह एकादशी अपार धन और पुण्यों को देने वाली तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इसका व्रत करते हैं, उनकी लोक में प्रसिद्धि होती है।अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, प्रेत योनि, दूसरे की निन्दा आदि से उत्पन्न पापों का नाश हो जाता है, इतना ही नहीं, स्त्रीगमन, झूठी गवाही, असत्य भाषण, झूठा वेद पढ़ना, झूठा शास्त्र बनाना, ज्योतिष द्वारा किसी को भरमाना, झूठा वैद्य बनकर लोगो को ठगना आदि भयंकर पाप भी अपरा एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाते हैं।
         युद्धक्षेत्र से भागे हुए क्षत्रिय को नरक की प्राप्ति होती है, किन्तु अपरा एकादशी का व्रत करने से उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। गुरू से विद्या अर्जित करने के उपरान्त जो शिष्य गरु की निन्दा करते हैं तो वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। अपरा एकादशी का व्रत करने से इनके लिये स्वर्ग जाना सम्भव हो जाता है। तीनों पुष्करों में स्नान करने से या कार्तिक माह में स्नान करने से अथवा गंगाजी के तट पर पितरों को पिण्डदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है।
        बृहस्पति के दिन गोमती नदी में स्नान करने से, कुम्भ मेंश्रीकेदारनाथजी के दर्शन करने से तथा बदरिकाश्रम में रहने से तथा सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल सिंह राशि वालों को प्राप्त होता है, वह फल अपरा एकादशी के व्रत के समान है। जो फल हाथी-घोड़े के दान से तथा यज्ञ में स्वर्णदान (सुवर्णदान) से प्राप्त होता है, वह फल अपरा एकादशी के व्रत के फल के बराबर है। गौ तथा भूमि या स्वर्ण के दान का फल भी इसके फल के समान होता है। पापरूपी वृक्षों को काटने के लिये यह व्रत कुल्हाड़ी के समान है तथा पापरूपी अन्धकार के लिये सूर्य के समान है। अतः मनुष्य को इस एकादशी का व्रत अवश्य ही करना चाहिये। यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है। अपरा एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीविष्णु का पूजन करना चाहिये। जिससे अन्त में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
        अपरा एकादशी का एक अन्य अर्थ यह कि ऐसी ऐसी एकादशी है जिसका पुण्य अपार है। इस एकादशी का व्रत करने से, ऐसे पापों से भी मुक्ति मिल जाती है जिससे व्यक्ति को प्रेत योनी में जाना पड़ सकता है। पद्मपुराण में बताया गया है कि इस एकादशी के व्रत से व्यक्ति को वर्तमान जीवन में चली आ रही आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है। अगले जन्म में व्यक्ति धनवान कुल में जन्म लेता है और अपार धन का उपभोग करता है। शास्त्रों में बताया गया है कि परनिंदा, झूठ, ठगी, छल ऐसे पाप हैं जिनके कारण व्यक्ति को नर्क में जाना पड़ता है। इस एकादशी के व्रत से इन पापों के प्रभाव में कमी आती है और व्यक्ति नर्क की यातना भोगने से बच जाता है। 

                        अपरा एकादशी की कथा 

          इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा। 
        एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।
       दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।

                                   व्रत विधि 

         इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा करने का शास्त्रीय विधान है। जिसके लिए मनुष्य को तन और मन से स्वच्छ होना चाहिए। इस पुण्य व्रत की शुरूआत दशमी के दिन से खान-पान, आचार-विचार द्वारा करनी चाहिए। एकादशी के दिन साधक को नित क्रियाओं से निवृत्त होकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु, कृष्ण तथा बलराम का धूप, दीप, फल, फूल, तिल आदि से पूजा करने का विशेष विधान है। पूरे दिन निर्जल उपवास करना चाहिए, यदि संभव ना हो तो पानी तथा एक समय फल आहार ले सकते हैं।
         द्वादशी के दिन यानि पारण के दिन भगवान का पुनः पूजन कर कथा का पाठ करना चाहिए। कथा पढ़ने के बाद प्रसाद वितरण, ब्राह्मण को भोजन तथा दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। अंत में भोजन ग्रहण कर उपवास खोलना चाहिए।
        पुराणों में एकादशी के व्रत के विषय में कहा गया है कि व्यक्ति को दशमी के दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह उठकर मन से सभी विकारों को निकाल दें और स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा में तुलसी पत्ता, श्रीखंड चंदन, गंगाजल एवं मौसमी फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए। व्रत रखने वाले को पूरे दिन परनिंदा, झूठ, छल-कपट से बचना चाहिए।  
       जो लोग किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं उन्हें एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए। इन्हें भी झूठ और परनिंदा से बचना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है।
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                               "जय श्रीहरि"
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आज गुरुवार है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेंगे, उसके बाद आपको कुछ काम की बातें बताऊंगी!!!!!#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती वनिता #कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️*बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥भावार्थ:-मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥अपने जीवन में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण जैसे कार्य सम्मलित किजियें, एक काम हम सबका है वह हैं -व्यक्ति निर्माण, हमें अपने आपके निर्माण की कसम खानी होगी, हम अपने स्वभाव को बदलें, हम अपने चिंतन को बदलें, हम अपने आचरण को बदलं।दूसरा परिवर्तन जो हमें करना है वो हमारे परिवार के सम्बन्ध में जो हमारी मान्यतायें हैं, जो आधार हैं, उनको बदलें, परिवार के व्यक्ति तो नहीं बदले जा सकते, हमारा अपने कुटुम्ब के प्रति जो रवैया है, जो हमारे सोचने का तरीका है,उसको हम आसानी से बदल सकते हैं।समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं, दायित्व हैं, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों से हम छुटकारा पा नहीं सकेंगे, समाज की उपेक्षा करते रहेंगे तो फिर समाज भी हमारी उपेक्षा करेगा और हमको कोई वजन नहीं मिलेगा, हम सम्मान नहीं पा सकेंगे, हम सहयोग नहीं पा सकेंगे, हमको समाज में सहयोग नहीं मिल सकेगा। न ही सम्मान मिल सकेगा।सम्मान और सहयोग ही मनुष्य की जीवात्मा की भूख और प्यास है, अगर हम उनको अपना बनाना चाहते हों तो कृपा करके यह विश्वास कीजिये कि जो समाज के प्रति हमारे दायित्व हैं, जो कर्तव्य हैं, वो हमें निभाने चाहिये, हम उन कर्तव्यों और दायित्वों को निभा लेंगे तो बदले में सम्मान और सहयोग पा लेंगे। जिससे हमारी खुशी, हमारी प्रशंसा और हमारी प्रगति में चार चाँद लग जायेंगे, दो काम हुयें, अपने आपका निर्माण करना, अपने परिवार का निर्माण करना, और तीसरा काम हैं अपने समाज को प्रगतिशील बनाने के लिये, उन्नतिशील बनाने के लिये कुछ न कुछ योगदान देना।तीन काम अगर हम कर पायें तो हमें समझना चाहिये कि हम आपने आत्मा की भूख को बुझाने के लिये और आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिये कुछ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया, अन्यथा ठीक है, हम अपने शरीर के लिये तो जिये ही हैं और शरीर के लिये तो मरना ही हैं। सज्जनों! अगर शरीर को ही हमने इष्ट देव समझा, इन्द्रियों के सुख को ही हमारी आकांक्षायें समझी और वासना और तृष्णा को ही हमने सब कुछ समझ लिया तो समझो हमने मानव जीवन लेकर भी कुछ नहीं किया, इनमें ही हमारा जीवन खर्च हो गया तो समझो हमारा जीवन व्यर्थ गया, जरा विचार किजियें, हमारा जीवन किस काम में खर्च हुआ? अब भी समय हैं सम्बल जाइयें, सादा जीवन-उच्च विचार के सिद्धान्तों का परिपालन कीजियें, सादगी, किफायतसारी, मितव्ययिता, अगर हमने ये अपना सिद्धान्त बना लिया तो विश्वास रखिये, हमारा बहुत कुछ काम हो जायेगा, बहुत समय बच जायेगा हमारे पास, और उन तीनों कर्तव्यों को पूरा करने के लिये हम समय और विचार भी निकाल सकेंगे। श्रम भी निकाल सकेंगे, पसीना भी निकाल सकेंगे, पैसा भी निकाल सकेंगे, और अगर आपने व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को जमीन-आसमान के तरीके से ऊँचा उठाकर के रखा होगा तो हमें अपना स्वयं का ही पूरा नहीं होगा, इसके लिये हमको अपनी कमाई से गुजारा नहीं हो सकता, फिर हमें बेईमानी करनी पड़ेगी, रिश्वत लेनी ही पडेगी, कम तोलना ही पड़ेगा, फिर दूसरों के साथ में दगाबाजी करनी ही पड़ेगी, फिर हमको कर्ज लेना भी पडेगा, मिलावट भी करनी पड़ेगी, जो भी हमें बुरे से बुरा कर्म भी करना पड सकता हैं।सज्जनों! अगर हम अपनी हविश को कम नहीं कर सकते और अपनी भौतिक खर्च की महत्त्वाकांक्षा को और बड़प्पन की महत्त्वाकांक्षा को काबू में नहीं कर सकते, फिर आत्मा की बात कहाँ चलती है? आत्मा की उन्नति की बात का सवाल कहाँ उठता है? भाई-बहनों! आत्मा को भी मान्यता दीजियें, शरीर ही सब कुछ नहीं है, शरीर की आकांक्षायें ही सब कुछ नहीं हैं, इन्द्रियाँ ही सब कुछ नहीं हैं, मन की लिप्सा और लालसा ही सब कुछ नहीं है। #Vnita❤️राधे राधे ❤️कहीं आत्मा भी हमारे भीतर है और आत्मा अगर हमारे भीतर है तो हमें ये भी विश्वास रखना होगा कि उसकी भी भूख और प्यास है, आत्मा के अनुदान भी असीम और असंख्य हैं, लेकिन उसकी भूख और प्यास भी है, पौधों के द्वारा, पेड़ों के द्वारा हरियाली भी मिलती है, छाया भी मिलती है, फल-फूल भी मिलते हैं, प्राणवायु भी मिलती है, पर उनकी जरूरत भी तो है न, हम जरूरत को क्यों भूल जाते हैं? खाद की जरूरत नहीं है? पानी की जरूरत नहीं है? रखवाली की जरूरत नहीं है?हम रखवाली नहीं करेंगे, खाद-पानी न देंगे तो पेड़ों से और पौधों से हम क्या आशा रखेंगे? इसी तरीके से जीवात्मा का पेड़ और वृक्ष तो है पर उसकी भी तो खुराक है, और खुराक क्या है? मैंने निवेदन किया है आपसे, व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के लिये हमारी गतिविधियाँ चलनी चाहिए और हमारे प्रयत्नों को अग्रगामी होना चाहियें, तभी जाकर हम, परिवार और समाज उन्नति कर सकते है।यह हमारी आध्यात्मिक सेवा है और इसी से हमें परमात्मा की प्राप्ति होगी, भाई-बहनों! आज गुरूवार के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् आप सभी को मंगलमय् हों, भगवान् श्री रामजी आप सभी की मनोकामनायें पूर्ण करें, आप सभी के जीवन में नैतिक मूल्यों और अध्यात्म की जागरूकता बढ़े, आप हमेशा आनन्दमय् जीवन जियें यहीं प्रभु से कामना।

आज गुरुवार है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेंगे, उसके बाद आपको कुछ काम की बातें बताऊंगी!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती वनिता #कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ भावार्थ:-मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥ अपने जीवन में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण जैसे कार्य सम्मलित किजियें, एक काम हम सबका है वह हैं -व्यक्ति निर्माण, हमें अपने आपके निर्माण की कसम खानी होगी, हम अपने स्वभाव को बदलें, हम अपने चिंतन को बदलें, हम अपने आचरण को बदलं। दूसरा परिवर्तन जो हमें करना है वो हमारे परिवार के सम्बन्ध में जो हमारी मान्यतायें हैं, जो आधार हैं, उनको बदलें, परिवार के व्यक्ति तो नहीं बदले जा सकते, हमारा अपने कुटुम्ब के प्रति जो रवैया है, जो हमारे सोचने का तरीका है,उसको हम आसानी से बदल सकते हैं। समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं, दायि...