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सच में गंगा स्नान से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं By Vnita kasnia Punjab गंगा स्नान हमारे सनातन धर्म में गंगा नदी को पवित्र नदी माना जाता है और आपने भी सुना होगा कि गंगा स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । परन्तु क्या यह सच है या केवल एक भ्रम?आइए मिलकर जानते हैं आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है । नमस्कार मित्रों getgyaan पर आपका स्वागत है । हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार की बात है भगवान शिव और माता पार्वती गंगा किनारे घूम रहे थे । उसी समय माता पार्वती ने देखा कि हजारों श्रद्धालु गंगा स्नान के बाद भगवान शिव का नाम लेते हुए बाहर निकल रहे हैं ।लोगों को ऐसा करते देख माता पार्वती तो पहले हैरान हो गई । फिर कुछ देर बाद उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि हे स्वामी! वैसे तो गंगा के जल को पापनाशनी कहा जाता है फिर भी मुझे इन लोगों को देखकर ऐसा क्यों लग रहा है कि इनमें से अधिकतर लोगों को अपने पापों से मुक्ति नहीं मिली है ।क्या गंगा पहले की तरह पवित्र नहीं रही? माता पार्वती के मुख से ऐसी बातें सुनकर भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले हे देवी आपको ऐसा क्यों लग रहा है? देवी गंगा तो पहले की तरह ही पवित्र और निर्मल है । आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अभी आपने जिन लोगों को गंगा स्नान कर बाहर निकलते हुए देखा, वास्तव में उन लोगों ने तो गंगा में स्नान किया ही नहीं ।क्या डुबकी लगाना ही गंगा स्नान है?तब देवी पार्वती पुनः भगवान शिव से बोली हे देवाधिदेव, लेकिन यह कैसे संभव हो सकता है कि आप देख नहीं पा रहे कि अभी भी कुछ लोग गंगा स्नान और डुबकी लगाने में रत है और जो लोग बाहर निकल आए हैं उनके कपड़े भी भीगे हुए है ।यह सुनकर भगवान शिव माता पार्वती के सवाल का जवाब देते हुए बोले है प्रिया ये सभी जल में डुबकी लगाकर निकल रहे हैं । कोई भी गंगा के पवित्र जल में स्नान नहीं कर रहा परंतु मेरी इस बात का रहस्य आप आज नहीं समझ पाएगी ।कल फिर आप मेरे साथ ही आना । तब मेरी सारी बात आपको समझ में आ जाएगी । इतना कहकर भगवान शिव माता पार्वती को अपने साथ साथ लेकर वहाँ से कैलाश को चले गए । अगले दिन माता पार्वती और भगवान शिव के पृथ्वी लोग पर आने से पहले बारिश शुरू हो गई थी । बारिश के कारण पृथ्वी लोग पर कीचड ही कीचड दिखाई दे रहा था ।क्या गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं?यह देख भगवान शिव पहले तो मंद मंद मुस्कुराने लगे और फिर कुछ छण बाद एक लाचार वृद्ध मनुष्य का वेश धारण कर गंगा किनारे पहुँच गए और एक गड्ढे में जाकर सो गए । फिर जब लोगों की भीड इकट्ठी हुई तो वो गड्ढे से निकलने की असफल कोशिश करने लगे । माता पार्वती जो एक वृद्ध महिला के रूप में उस गड्ढे के ऊपर खड़ी थी वो जोर जोर से आवाज लगाने लगी । कोई है जो मेरे वृद्ध एवं असहाय पति को गड्ढे से बाहर निकाल सके । कोई पुण्यात्मा रहम करो और गड्ढे से निकालकर मेरे पति के प्राण बचाओ परंतु जो भी मेरे पति को बाहर निकालने के लिए आएगा उसे मुझे विश्वास दिलाना होगा कि उसने अपने जीवन में कोई पाप ना किया हो नहीं तो वो हाथ लगाते ही जलकर भस्म हो जाएगा ।माता पार्वती की ये बातें गंगा स्नान कर रहे उस रास्ते से निकलने वाले सभी लोग सुनते लेकिन वृद्ध महिला की बातें सुनकर सभी के मन में अपने पापों का ख्याल आ जाता और फिर आगे बढ़ जाते हैं । इतना ही नहीं कई लोग लोकलज्जा और धर्म के डर से भी उस महिला के पास नहीं गए । कई लोगों ने महिला रूपी माता पार्वती से यहाँ तक कहा की तुम इस बुड्ढे को मरने के लिए छोड़ क्यों नहीं देती । इसी तरह कई लोग आए और माता पार्वती की बातें सुनकर वहाँ से चले गए । इसी तरह पूरा दिन बीत गया और शाम हो चली ।एक आदमी जिसे विश्वास था गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैंतब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा देखा प्रिया गंगा में नहाने वाला कोई भी मुझे बचाने नहीं आया । उसी समय एक युवक हाथ में जलपात्र लिए हर हर महादेव करते हुए वहाँ से निकला । उस युवक को देख माता पार्वती ने उसे भी वही बात बताई और मदद मांगी । वृद्ध महिला रूपी माता पार्वती की बात सुनकर युवक का हृदय करूणा से भराया और उसने शिवजी रूप उस वृद्ध व्यक्ति को गड्ढे से बाहर निकालने की तैयारी की ।यह देख माता पार्वती उसे रोकते हुए कहने लगी कि यदि तुमने कोई पाप ना किया हो तो ही मेरे पति को हाथ लगाना अन्यथा जलकर भस्म हो जाओगे । यह सुन उस युवक ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पार्वती जी से कहा कि माता मेरे निष्पाप होने में कोई संदेह नहीं है? देखती नहीं । मैं अभी गंगा नहा कर आया हूँ । भला गंगा में गोता लगाने के बाद भी कोई पापी रहता है क्या । इतना कहकर उसने वृद्ध रूप में गड्ढे में पडे शिव जी को बाहर निकाल लिया ।क्या है वास्तविक गंगा स्नान?यह देख भगवान शिव और माता पार्वती उस युवक पर प्रसन्न हो गए और दोनों ही अपने असली रूप में आ गए और युवक को आशीर्वाद देकर वहाँ से अपने निवास अर्थात कैलाश को लौट गए । तब रास्ते में शिव जी ने माता पार्वती से कहा देखा प्रिया, इतने लोगों में उस युवक ने ही पवित्र गंगा में स्नान किया और बाकी लोग तो गंगा में स्नान करके केवल अपने शरीर को धो रहे थे ।तो मित्रो आप समझ ही गए होंगे कि बिना श्रद्धा और विश्वास के केवल दंभ के लिए गंगा स्नान करने से पाप नहीं धुलते बल्कि इसके लिए आपको अपने मन को श्रद्धावान भी करना आवश्यक होता है । परन्तु इसका मतलब नहीं कि गंगा स्नान व्यर्थ जाता है । इसलिए जिन लोगों के मन में है विश्वास ही नहीं है कि गंगा स्नान से उनके मन के पाप कम हो जाएँगे ।इसी के साथ विदा लेते हैं पोस्ट पसंद आयी हो तो इसे शेयर जरूर करें । पोस्ट की जानकारी के लिए व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करें। ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Whatsapp । धन्यवाद !

सच में गंगा स्नान से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं 


गंगा स्नान
 हमारे सनातन धर्म में गंगा नदी को पवित्र नदी माना जाता है और आपने भी सुना होगा कि गंगा स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । परन्तु क्या यह सच है या केवल एक भ्रम?

आइए मिलकर जानते हैं आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है । नमस्कार मित्रों getgyaan पर आपका स्वागत है । हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार की बात है भगवान शिव और माता पार्वती गंगा किनारे घूम रहे थे । उसी समय माता पार्वती ने देखा कि हजारों श्रद्धालु गंगा स्नान के बाद भगवान शिव का नाम लेते हुए बाहर निकल रहे हैं ।


लोगों को ऐसा करते देख माता पार्वती तो पहले हैरान हो गई । फिर कुछ देर बाद उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि हे स्वामी! वैसे तो गंगा के जल को पापनाशनी कहा जाता है फिर भी मुझे इन लोगों को देखकर ऐसा क्यों लग रहा है कि इनमें से अधिकतर लोगों को अपने पापों से मुक्ति नहीं मिली है ।

क्या गंगा पहले की तरह पवित्र नहीं रही? माता पार्वती के मुख से ऐसी बातें सुनकर भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले हे देवी आपको ऐसा क्यों लग रहा है? देवी गंगा तो पहले की तरह ही पवित्र और निर्मल है । आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अभी आपने जिन लोगों को गंगा स्नान कर बाहर निकलते हुए देखा, वास्तव में उन लोगों ने तो गंगा में स्नान किया ही नहीं ।

क्या डुबकी लगाना ही गंगा स्नान है?
तब देवी पार्वती पुनः भगवान शिव से बोली हे देवाधिदेव, लेकिन यह कैसे संभव हो सकता है कि आप देख नहीं पा रहे कि अभी भी कुछ लोग गंगा स्नान और डुबकी लगाने में रत है और जो लोग बाहर निकल आए हैं उनके कपड़े भी भीगे हुए है ।

यह सुनकर भगवान शिव माता पार्वती के सवाल का जवाब देते हुए बोले है प्रिया ये सभी जल में डुबकी लगाकर निकल रहे हैं । कोई भी गंगा के पवित्र जल में स्नान नहीं कर रहा परंतु मेरी इस बात का रहस्य आप आज नहीं समझ पाएगी ।

कल फिर आप मेरे साथ ही आना । तब मेरी सारी बात आपको समझ में आ जाएगी । इतना कहकर भगवान शिव माता पार्वती को अपने साथ साथ लेकर वहाँ से कैलाश को चले गए । अगले दिन माता पार्वती और भगवान शिव के पृथ्वी लोग पर आने से पहले बारिश शुरू हो गई थी । बारिश के कारण पृथ्वी लोग पर कीचड ही कीचड दिखाई दे रहा था ।

क्या गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं?
यह देख भगवान शिव पहले तो मंद मंद मुस्कुराने लगे और फिर कुछ छण बाद एक लाचार वृद्ध मनुष्य का वेश धारण कर गंगा किनारे पहुँच गए और एक गड्ढे में जाकर सो गए । फिर जब लोगों की भीड इकट्ठी हुई तो वो गड्ढे से निकलने की असफल कोशिश करने लगे । माता पार्वती जो एक वृद्ध महिला के रूप में उस गड्ढे के ऊपर खड़ी थी वो जोर जोर से आवाज लगाने लगी । कोई है जो मेरे वृद्ध एवं असहाय पति को गड्ढे से बाहर निकाल सके । कोई पुण्यात्मा रहम करो और गड्ढे से निकालकर मेरे पति के प्राण बचाओ परंतु जो भी मेरे पति को बाहर निकालने के लिए आएगा उसे मुझे विश्वास दिलाना होगा कि उसने अपने जीवन में कोई पाप ना किया हो नहीं तो वो हाथ लगाते ही जलकर भस्म हो जाएगा ।

माता पार्वती की ये बातें गंगा स्नान कर रहे उस रास्ते से निकलने वाले सभी लोग सुनते लेकिन वृद्ध महिला की बातें सुनकर सभी के मन में अपने पापों का ख्याल आ जाता और फिर आगे बढ़ जाते हैं । इतना ही नहीं कई लोग लोकलज्जा और धर्म के डर से भी उस महिला के पास नहीं गए । कई लोगों ने महिला रूपी माता पार्वती से यहाँ तक कहा की तुम इस बुड्ढे को मरने के लिए छोड़ क्यों नहीं देती । इसी तरह कई लोग आए और माता पार्वती की बातें सुनकर वहाँ से चले गए । इसी तरह पूरा दिन बीत गया और शाम हो चली ।

एक आदमी जिसे विश्वास था गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं
तब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा देखा प्रिया गंगा में नहाने वाला कोई भी मुझे बचाने नहीं आया । उसी समय एक युवक हाथ में जलपात्र लिए हर हर महादेव करते हुए वहाँ से निकला । उस युवक को देख माता पार्वती ने उसे भी वही बात बताई और मदद मांगी । वृद्ध महिला रूपी माता पार्वती की बात सुनकर युवक का हृदय करूणा से भराया और उसने शिवजी रूप उस वृद्ध व्यक्ति को गड्ढे से बाहर निकालने की तैयारी की ।
यह देख माता पार्वती उसे रोकते हुए कहने लगी कि यदि तुमने कोई पाप ना किया हो तो ही मेरे पति को हाथ लगाना अन्यथा जलकर भस्म हो जाओगे । यह सुन उस युवक ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पार्वती जी से कहा कि माता मेरे निष्पाप होने में कोई संदेह नहीं है? देखती नहीं । मैं अभी गंगा नहा कर आया हूँ । भला गंगा में गोता लगाने के बाद भी कोई पापी रहता है क्या । इतना कहकर उसने वृद्ध रूप में गड्ढे में पडे शिव जी को बाहर निकाल लिया ।

क्या है वास्तविक गंगा स्नान?यह देख भगवान शिव और माता पार्वती उस युवक पर प्रसन्न हो गए और दोनों ही अपने असली रूप में आ गए और युवक को आशीर्वाद देकर वहाँ से अपने निवास अर्थात कैलाश को लौट गए । तब रास्ते में शिव जी ने माता पार्वती से कहा देखा प्रिया, इतने लोगों में उस युवक ने ही पवित्र गंगा में स्नान किया और बाकी लोग तो गंगा में स्नान करके केवल अपने शरीर को धो रहे थे ।
तो मित्रो आप समझ ही गए होंगे कि बिना श्रद्धा और विश्वास के केवल दंभ के लिए गंगा स्नान करने से पाप नहीं धुलते बल्कि इसके लिए आपको अपने मन को श्रद्धावान भी करना आवश्यक होता है । परन्तु इसका मतलब नहीं कि गंगा स्नान व्यर्थ जाता है । इसलिए जिन लोगों के मन में है विश्वास ही नहीं है कि गंगा स्नान से उनके मन के पाप कम हो जाएँगे ।इसी के साथ विदा लेते हैं पोस्ट पसंद आयी हो तो इसे शेयर जरूर करें ।  पोस्ट की जानकारी के लिए व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करें। ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Whatsapp । धन्यवाद !

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❁══❁❁═ ══❁❁══❁❁ राधे माला किर्तन पोस्ट ❁❁══❁❁═ ══❁❁══❁हे कृष्ण🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏सुना है , आँखों मे तेरी , प्रेम समन्दर बसते हैं । फिर भी हम, एक बून्द , पानी को तरसते हैं ।🌹मिटा दो , जन्मों जन्मों की प्यास , साँवरे। 💐🪻प्रेम उत्सव मे बीत जाये , जीवन डगर प्यारे।🌹🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।भक्तो की तुमने विपदा टारी मुझे भी आके थाम मुरलीवाले।।🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷विघ्न बनाये तुमने, कर पार मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸पतझड़ है मेरा जीवन, बन के बहार आजा।सुन ले पुकार कान्हा, बस एक बार आजा।बैचैन मन के तुम ही, आराम मुरली वाले॥💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥तुम हो दया के सागर, जनमों की मैं हूँ प्यासी।दे दो जगह मुझे भी, चरणों में बस ज़रा सी।सुबह तुम ही हो, तुम ही, मेरी शाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿रूप सलोना देख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई,कमली श्याम दी कमली,कमली श्याम दी कमली।।🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻सखी पनघट पर यमुना के तट पर,लेकर पहुंची मटकी,भूल गई सब एक बार जब,छवि देखि नटखट की,देखत ही मैं हुई बाँवरी,उसी रूप में खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁कदम के नीचे अखियाँ मीचे,खड़ा था नन्द का लाला,मुख पर हंसी हाथ में बंसी,मोर मुकुट गल माला,तान सुरीली मधुर नशीली,तन मन दियो भिगोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹सास ननन्द मोहे पल-पल कोसे,हर कोई देवे ताने,बीत रही क्या मुझ बिरहन पर,ये कोई नहीं जाने,पूछे सब निर्दोष बावरी,तट पर काहे गई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺रूप सलोना देख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई,कमली श्याम दी कमली,कमली श्याम दी कमली।।#Vnitaराधे राधे 🌲🙏🌲🙏🌲🙏🌲🙏🌲#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #टीम #द्वारका जी जाते हुए ◢█◈★◈■⚀■◈★◈█◣GOOD MORNING DOS ⫷▓▓▓(✴ ✴)▓▓▓ ◥█◈★◈■⚀■◈★◈ ██ ◥◤★ 💕कुछ गहरा सा लिखना था___❦︎ इश्क से ज्यादा क्या लिखूं,❦︎❣︎_____सुनो अब #जिंदगी _लिखनी है___ #तुमसे_ज्यादा क्या लिखूं..!! 🍒🌷 नस_नस मे #नशा है ते हर #सांस को तेरी ही #तलब है, ऐसे मे 🥰 अब दूर कैसे रहूँ #तुझसे तू ही #इश्क मेरा, 🥰तू ही #मोहब्बत है।❣️💞तोड़ दूँ.....सारी 🥰 “बंदिशें और 😘 तुझसे लिपट......जाऊं..!❣️💞💖सुन.....लूँ तेरी “धड़कन“🥰 और....तेरी 😘बाहों में सिमट जाऊं..!💞💞❣️छू लूँ🥰 मेरे “सांसो“ से..... तेरे “सांसो तेरी...... हर सांस में घुल 😘जाऊं..!💞 💞💖तेरे 🥰 "दिल" में... उतर कर, तेरी.... "रूह" से मिल 😘जाऊं..!!💞 #Vnita 🖤♦️━━•❣️•✮✮┼ ◢ ▇ ◣ ♥️ ◢ ▇ ▇ ▇ ▇ ◣ ◢ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ▇ ▇ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ◥ ╔══❤️═ ♥️ #कान्हा ╚══❤️═राधे रादेधे═╝♥️═╗ ◤ ◤ ◤ ◤ ▇ ◣┼✮┼✮━━♦️💖🖤💖 ❣️“ को,💖 को,💞“💖 मै,💖रा 💖🍒🌷💖❣︎◥◤◥◤ ██████◤⫸ TO

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दर्शनशास्त्र के अनुसारभारतीय आस्तिक दर्शनशास्त्र के मत में शब्द के नित्य होने से उसका अर्थ के साथ स्वयम्भू-जैसा सम्बन्ध होता है। वेद में शब्द को नित्य समझने पर वेद को अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) माना गया है। निरूक्तकार भी इसका प्रतिपादन करते हैं। आस्तिक दर्शन ने शब्द को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण मान्य किया है। इस विषय में मीमांसा- दर्शन तथा न्याय-दर्शन के मत भिन्न-भिन्न हैं। जैमिनीय मीमांसक, कुमारिल आदि मीमांसक, आधुनिक मीमांसक तथा सांख्यवादियों के मत में वेद अपौरुषेय, नित्य एवं स्वत:प्रमाण हैं। मीमांसक वेद को स्वयम्भू मानते हैं। उनका कहना है कि वेद की निर्मिति का प्रयत्न किसी व्यक्ति-विशेष का अथवा ईश्वर का नहीं है। नैयायिक ऐसा समझते हैं कि वेद तो ईश्वरप्रोक्त है। मीमांसक कहते हैं कि भ्रम, प्रमाद, दुराग्रह इत्यादि दोषयुक्त होने के कारण मनुष्य के द्वारा वेद-जैसे निर्दोष महान ग्रन्थरत्न की रचना शक्य ही नहीं है। अत: वेद अपौरुषेय ही है। इससे आगे जाकर नैयायिक ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर ने जैसे सृष्टि की, वैसे ही वेद का निर्माण किया; ऐसा मानना उचित ही है।श्रुति के मतानुसार वेद तो महाभूतों का नि:श्वास (यस्य नि:श्वतिसं वेदा...) है। श्वास-प्रश्वास स्वत: आविर्भूत होते हैं, अत: उनके लिये मनुष्य के प्रयत्न की अथवा बुद्धि की अपेक्षा नहीं होती। उस महाभूत का नि:श्वासरूप वेद तो अदृष्टवशात अबुद्धिपूर्वक स्वयं आविर्भूत होता है।वेद नित्य-शब्द की संहृति होने से नित्य है और किसी भी प्रकार से उत्पाद्य नहीं है; अत: स्वत: आविर्भूत वेद किसी भी पुरुष से रचा हुआ न होने के कारण अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) सिद्ध होता है। इन सभी विचारों को दर्शन शास्त्र में अपौरुषेयवाद कहा गया है।अवैदिक दर्शन को नास्तिक दर्शन भी कहते हैं, क्योंकि वह वेद को प्रमाण नहीं मानता, अपौरुषेय स्वीकार नहीं करता। उसका कहना है कि इहलोक (जगत) ही आत्मा का क्रीडास्थल है, परलोक (स्वर्ग) नाम की कोई वस्तु नहीं है, 'काम एवैक: पुरुषार्थ:'- काम ही मानव-जीवन का एकमात्र पुरुषार्थ होता है, 'मरणमेवापवर्ग:'- मरण (मृत्यु) माने ही मोक्ष (मुक्ति) है, 'प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्'- जो प्रत्यक्ष है वही प्रमाण है (अनुमान प्रमाण नहीं है)। धर्म ही नहीं है, अत: अधर्म नहीं है; स्वर्ग-नरक नहीं हैं। 'न परमेश्वरोऽपि कश्चित्'- परमेश्वर –जैसा भी कोई नहीं है, 'न धर्म: न मोक्ष:'- न तो धर्म है न मोक्ष है। अत: जब तक शरीर में प्राण है, तब तक सुख प्राप्त करते हैं- इस विषय में नास्तिक चार्वाक-दर्शन स्पष्ट कहता है-यावज्जीवं सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिबेत्।भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:॥[17]चार्वाक-दर्शन शब्द में 'चर्व' का अर्थ है-खाना। इस 'चर्व' पद से ही 'खाने-पीने और मौज' करने का संदेश देने वाले इस दर्शन का नाम 'चार्वाक-दर्शन' पड़ा है। 'गुणरत्न' ने इसकी व्याख्या इस प्रकार से की है- परमेश्वर, वेद, पुण्य-पाप, स्वर्ग-नरक, आत्मा, मुक्ति इत्यादि का जिसने 'चर्वण' (नामशेष) कर दिया है, वह 'चार्वाक-दर्शन' है। इस मत के लोगों का लक्ष्य स्वमतस्थापन की अपेक्षा परमतखण्डन के प्रति अधिक रहने से उनको 'वैतंडिक' कहा गया है। वे लोग वेदप्रामाण्य मानते ही नहीं।1.जगत,2.जीव,3.ईश्वर और4.मोक्ष- ये ही चार प्रमुख प्रतिपाद्य विषय सभी दर्शनों के होते हैं।आचार्य श्रीहरिभद्र ने 'षड्दर्शन-समुच्चय' नाम का अपने ग्रन्थ में1.न्याय,2.वैशेषिक,3.सांख्य,4.योग,5.मीमांसा और6.वेदान्त- इन छ: को वैदिक दर्शन (आस्तिक-दर्शन) तथा7.चार्वाक,8.बौद्ध और9.जैन-इन तीन को 'अवैदिक दर्शन' (नास्तिक-दर्शन) कहा है और उन सब पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया है। वेद को प्रमाण मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक हैं, इस दृष्टि से उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि षड्दर्शन को आस्तिक और चार्वाकादि दर्शन को नास्तिक कहा गया है।मनु स्मृति में वेद ही By वनिता कासनियां पंजाबमनुस्मृति कहती है- 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेय:'[6] 'आदिसृष्टिमारभ्याद्यपर्यन्तं ब्रह्मादिभि: सर्वा: सत्यविद्या: श्रूयन्ते सा श्रुति:॥'[7] वेदकालीन महातपा सत्पुरुषों ने समाधि में जो महाज्ञान प्राप्त किया और जिसे जगत के आध्यात्मिक अभ्युदय के लिये प्रकट भी किया, उस महाज्ञान को 'श्रुति' कहते हैं।श्रुति के दो विभाग हैं-1.वैदिक और2.तान्त्रिक- 'श्रुतिश्च द्विविधा वैदिकी तान्त्रिकी च।'मुख्य तन्त्र तीन माने गये हैं-1.महानिर्वाण-तन्त्र,2.नारदपाञ्चरात्र-तन्त्र और3.कुलार्णव-तन्त्र।वेद के भी दो विभाग हैं-1.मन्त्र विभाग और2.ब्राह्मण विभाग- 'वेदो हि मन्त्रब्राह्मणभेदेन द्विविध:।'वेद के मन्त्र विभाग को संहिता भी कहते हैं। संहितापरक विवेचन को 'आरण्यक' एवं संहितापरक भाष्य को 'ब्राह्मणग्रन्थ' कहते हैं। वेदों के ब्राह्मणविभाग में' आरण्यक' और 'उपनिषद'- का भी समावेश है। ब्राह्मणविभाग में 'आरण्यक' और 'उपनिषद'- का भी समावेश है। ब्राह्मणग्रन्थों की संख्या 13 है, जैसे ऋग्वेद के 2, यजुर्वेद के 2, सामवेद के 8 और अथर्ववेद के 1 ।मुख्य ब्राह्मणग्रन्थ पाँच हैं-ऋग्वेद का आवरण1.ऐतरेय ब्राह्मण,2.तैत्तिरीय ब्राह्मण,3.तलवकार ब्राह्मण,4.शतपथ ब्राह्मण और5.ताण्डय ब्राह्मण।उपनिषदों की संख्या वैसे तो 108 हैं, परंतु मुख्य 12 माने गये हैं, जैसे-1.ईश,2.केन,3.कठ,4.प्रश्न,5.मुण्डक,6.माण्डूक्य,7.तैत्तिरीय,8.ऐतरेय,9.छान्दोग्य,10.बृहदारण्यक,11.कौषीतकि और12.श्वेताश्वतर। दर्शन शास्त्र के अनुसारभारतीय आस्तिक दर्शनशास्त्र के मत में शब्द के नित्य होने से उसका अर्थ के साथ स्वयम्भू-जैसा सम्बन्ध होता है। वेद में शब्द को नित्य समझने पर वेद को अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) माना गया है। निरूक्तकार भी इसका प्रतिपादन करते हैं। आस्तिक दर्शन ने शब्द को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण मान्य किया है। इस विषय में मीमांसा- दर्शन तथा न्याय-दर्शन के मत भिन्न-भिन्न हैं। जैमिनीय मीमांसक, कुमारिल आदि मीमांसक, आधुनिक मीमांसक तथा सांख्यवादियों के मत में वेद अपौरुषेय, नित्य एवं स्वत:प्रमाण हैं। मीमांसक वेद को स्वयम्भू मानते हैं। उनका कहना है कि वेद की निर्मिति का प्रयत्न किसी व्यक्ति-विशेष का अथवा ईश्वर का नहीं है। नैयायिक ऐसा समझते हैं कि वेद तो ईश्वरप्रोक्त है। मीमांसक कहते हैं कि भ्रम, प्रमाद, दुराग्रह इत्यादि दोषयुक्त होने के कारण मनुष्य के द्वारा वेद-जैसे निर्दोष महान ग्रन्थरत्न की रचना शक्य ही नहीं है। अत: वेद अपौरुषेय ही है। इससे आगे जाकर नैयायिक ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर ने जैसे सृष्टि की, वैसे ही वेद का निर्माण किया; ऐसा मानना उचित ही है।श्रुति के मतानुसार वेद तो महाभूतों का नि:श्वास (यस्य नि:श्वतिसं वेदा...) है। श्वास-प्रश्वास स्वत: आविर्भूत होते हैं, अत: उनके लिये मनुष्य के प्रयत्न की अथवा बुद्धि की अपेक्षा नहीं होती। उस महाभूत का नि:श्वासरूप वेद तो अदृष्टवशात अबुद्धिपूर्वक स्वयं आविर्भूत होता है।वेद नित्य-शब्द की संहृति होने से नित्य है और किसी भी प्रकार से उत्पाद्य नहीं है; अत: स्वत: आविर्भूत वेद किसी भी पुरुष से रचा हुआ न होने के कारण अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) सिद्ध होता है। इन सभी विचारों को दर्शन शास्त्र में अपौरुषेयवाद कहा गया है।अवैदिक दर्शन को नास्तिक दर्शन भी कहते हैं, क्योंकि वह वेद को प्रमाण नहीं मानता, अपौरुषेय स्वीकार नहीं करता। उसका कहना है कि इहलोक (जगत) ही आत्मा का क्रीडास्थल है, परलोक (स्वर्ग) नाम की कोई वस्तु नहीं है, 'काम एवैक: पुरुषार्थ:'- काम ही मानव-जीवन का एकमात्र पुरुषार्थ होता है, 'मरणमेवापवर्ग:'- मरण (मृत्यु) माने ही मोक्ष (मुक्ति) है, 'प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्'- जो प्रत्यक्ष है वही प्रमाण है (अनुमान प्रमाण नहीं है)। धर्म ही नहीं है, अत: अधर्म नहीं है; स्वर्ग-नरक नहीं हैं। 'न परमेश्वरोऽपि कश्चित्'- परमेश्वर –जैसा भी कोई नहीं है, 'न धर्म: न मोक्ष:'- न तो धर्म है न मोक्ष है। अत: जब तक शरीर में प्राण है, तब तक सुख प्राप्त करते हैं- इस विषय में नास्तिक चार्वाक-दर्शन स्पष्ट कहता है-यावज्जीवं सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिबेत्।भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:॥[17]चार्वाक-दर्शन शब्द में 'चर्व' का अर्थ है-खाना। इस 'चर्व' पद से ही 'खाने-पीने और मौज' करने का संदेश देने वाले इस दर्शन का नाम 'चार्वाक-दर्शन' पड़ा है। 'गुणरत्न' ने इसकी व्याख्या इस प्रकार से की है- परमेश्वर, वेद, पुण्य-पाप, स्वर्ग-नरक, आत्मा, मुक्ति इत्यादि का जिसने 'चर्वण' (नामशेष) कर दिया है, वह 'चार्वाक-दर्शन' है। इस मत के लोगों का लक्ष्य स्वमतस्थापन की अपेक्षा परमतखण्डन के प्रति अधिक रहने से उनको 'वैतंडिक' कहा गया है। वे लोग वेदप्रामाण्य मानते ही नहीं।1.जगत,2.जीव,3.ईश्वर और4.मोक्ष- ये ही चार प्रमुख प्रतिपाद्य विषय सभी दर्शनों के होते हैं।आचार्य श्रीहरिभद्र ने 'षड्दर्शन-समुच्चय' नाम का अपने ग्रन्थ में1.न्याय,2.वैशेषिक,3.सांख्य,4.योग,5.मीमांसा और6.वेदान्त- इन छ: को वैदिक दर्शन (आस्तिक-दर्शन) तथा7.चार्वाक,8.बौद्ध और9.जैन-इन तीन को 'अवैदिक दर्शन' (नास्तिक-दर्शन) कहा है और उन सब पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया है। वेद को प्रमाण मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक हैं, इस दृष्टि से उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि षड्दर्शन को आस्तिक और चार्वाकादि दर्शन को नास्तिक कहा गया है।By वनिता कासनियां पंजाब

दर्शनशास्त्र के अनुसार भारतीय आस्तिक दर्शनशास्त्र के मत में शब्द के नित्य होने से उसका अर्थ के साथ स्वयम्भू-जैसा सम्बन्ध होता है। वेद में शब्द को नित्य समझने पर वेद को अपौरुषेय (ईश्वरप्रणीत) माना गया है। निरूक्तकार भी इसका प्रतिपादन करते हैं। आस्तिक दर्शन ने शब्द को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण मान्य किया है। इस विषय में मीमांसा- दर्शन तथा न्याय-दर्शन के मत भिन्न-भिन्न हैं। जैमिनीय मीमांसक, कुमारिल आदि मीमांसक, आधुनिक मीमांसक तथा सांख्यवादियों के मत में वेद अपौरुषेय, नित्य एवं स्वत:प्रमाण हैं। मीमांसक वेद को स्वयम्भू मानते हैं। उनका कहना है कि वेद की निर्मिति का प्रयत्न किसी व्यक्ति-विशेष का अथवा ईश्वर का नहीं है। नैयायिक ऐसा समझते हैं कि वेद तो ईश्वरप्रोक्त है। मीमांसक कहते हैं कि भ्रम, प्रमाद, दुराग्रह इत्यादि दोषयुक्त होने के कारण मनुष्य के द्वारा वेद-जैसे निर्दोष महान ग्रन्थरत्न की रचना शक्य ही नहीं है। अत: वेद अपौरुषेय ही है। इससे आगे जाकर नैयायिक ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर ने जैसे सृष्टि की, वैसे ही वेद का निर्माण किया; ऐसा मानना उचित ही है। श्रुति के मतानुसार वेद तो महाभूतों का नि:श्...