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राष्ट्र हिंदू धर्म में क्या अहिल्या वास्तव में निर्दोष थी? By वनिता कासनियां पंजाब आपमें से कई लोग सोच रहे होंगे कि आज मैं ये कौन सा विषय लेकर आ गया। हम सभी ने हमेशा यही पढ़ा है कि पंचकन्याओं में से एक अहिल्या सर्वथा निर्दोष थी और महर्षि गौतम ने उन्हें बिना सत्य जाने श्राप दे दिया था। बाद में श्रीराम ने उनका उद्धार किया था। बरसों से हम यही सुनते और देखते आ रहे हैं। किन्तु आज हम इस घटना के सत्य को जानने का प्रयत्न करेंगे।ऐसी शंकाएं लोगों के मन में केवल इसलिए आती हैं क्यूंकि उन्होंने कभी मूल ग्रन्थ पढ़ा ही नहीं होता। और जब मैं बोल रहा हूँ मूल ग्रन्थ, तो मैं वाल्मीकि रामायण की बात कर रहा हूँ, ना कि रामचरितमानस की। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के समाज में रामचरितमानस वाल्मीकि रामायण से बहुत अधिक प्रचलित है किन्तु मूल ग्रन्थ तो वाल्मीकि रामायण ही है।अब चूँकि रामचरितमानस इतनी अधिक प्रचलित है, लोग उसी को पढ़ते हैं। यहाँ तक कि १९८७ में बनी रामानंद सागर का प्रसिद्ध सीरियल रामायण भी मुख्यतः रामचरितमानस पर ही आधारित था। अब जब लोग वही पढ़ते और देखते हैं जो हमारे सामने है, वे उस सत्य को नहीं जान पाते जो कि मूल ग्रन्थ में लिखा गया है। तो यदि आपको इस प्रश्न का वास्तविक उत्तर चाहिए तो आपको वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का ४८ वां सर्ग पढ़ना चाहिए।अब जो मैं बताने जा रहा हूँ उसे बड़े ध्यान से सुनिए और एक बात का विशेष ध्यान रखिये कि मैं ये बातें मूल वाल्मीकि रामायण से बता रहा हूँ। इसीलिए यदि आपने रामचरितमानस या रामायण का कोई और संस्करण पढ़ा है या कोई टीवी सीरियल देखा हो तो उसे एक पल के लिए भूल जाइये। वैसे तो वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के ४८ वें सर्ग में कुल ३३ श्लोक हैं किन्तु मैं केवल दो श्लोकों का वर्णन करूँगा जिससे आपको बात समझ में आ जाएगी।लोगों की ये आम धारणा है कि इंद्र गौतम ऋषि का वेश बना कर आये इसी कारण अहिल्या उन्हें पहचान नहीं पायी, जो कि बिलकुल गलत है। अहिल्या का जन्म स्वयं ब्रह्मदेव से हुआ था और उन्हें छला नहीं जा सकता था। वाल्मीकि रामायण में ये साफ लिखा है कि जब इंद्र गौतम ऋषि के वेश में आये और अहिल्या से प्रणय याचना की तब अहिल्या ने ये जान लिया था कि ये उनके पति नहीं हैं। किन्तु ये जान कर कि स्वयं देवराज इंद्र उनसे प्रणय याचना कर रहे हैं, अहिल्या ने सब कुछ जानते बुझते कौतुहल में उनकी बात मान ली। यह बात महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को बताते हैं।मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक १९अर्थात: ‘रघुनन्दन ! महर्षि गौतम का वेष धारण करके आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारी ने ‘अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं’ इस कौतूहल वश उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।यहाँ तक कि इंद्र से समागम के पश्चात अहिल्या इंद्र को धन्यवाद देते हुए कहती हैं कि अब आप शीघ्रता से यहाँ से चले जाइये और महर्षि गौतम के क्रोध से मेरी और स्वयं अपनी रक्षा कीजिये।अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना।कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमितः प्रभो॥आत्मानं मां च देवेश सर्वथा रक्ष गौतमात्। बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २०अर्थात: ‘रति के पश्चात् उसने देवराज इन्द्र से संतुष्टचित्त होकर कहा–’सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँ से चले जाइये। देवेश्वर! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी भी सब प्रकार से रक्षा कीजिये’।इसके बाद की कथा हम जानते हैं कि जब इंद्र वापस जाने के लिए बाहर निकले तो महर्षि गौतम ने उन्हें देख लिया। ये देख कर महर्षि गौतम ने प्रथम दंड इंद्र को ही दिया। महर्षि गौतम ने इंद्र को नपुंसक हो जाने का श्राप दे दिया।मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते।अकर्तव्यमिदं यस्माद विफलस्त्वं भविष्यसि॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २७अर्थात: “दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करने योग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल (अण्डकोषों से रहित) हो जायगा’।गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना।पेततुर्वृषणी भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात्॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २८अर्थात: ‘रोष में भरे हुए महात्मा गौतम के ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्र के दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़े।अब आते हैं अहिल्या के दंड पर। लोगों को ऐसा लगता है कि महर्षि गौतम ने उन्हें पत्थर बन जाने का श्राप दिया, पर ये भी गलत है। वास्तव में गौतम ऋषि ने अहिल्या को कई हजार वर्षों तक अदृश्य रूप में उसी आश्रम में प्रायश्चित करने का श्राप दिया।तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान्।इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि ॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २९वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक ३०अर्थात: इन्द्र को इस प्रकार शाप देकर गौतम ने अपनी पत्नी को भी शाप दिया - 'दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इस आश्रम में निवास करेगी।'यदा त्वेतद् वनं घोरं रामो दशरथात्मजः।आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक ३१तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता।।मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि॥ बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक ३२अर्थात: जब दुर्धर्ष दशरथ-कुमार राम इस घोर वन में पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करने से तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी।’लोग ऐसा भी सोचते हैं कि श्रीराम ने शिलरूपी अहिल्या के मस्तक पर अपने चरण रख कर उसका उद्धार किया था, जो बिलकुल गलत है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के ४९ वें सर्ग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम से कहते हैं कि 'हे राम! ये तपस्विनी सहस्त्रों वर्षों से तप करते हुए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है इसलिए तुम दोनों भाई जाकर इसके चरण छुओ।' तब श्रीराम और लक्ष्मण अहिल्या के चरण छूते हैं जिससे अहिल्या श्रापमुक्त होती है और तब महर्षि गौतम पुनः उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करते हैं।राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा।स्मरन्ती गौतमवचः प्रतिजग्राह सा हि तौ॥बालकाण्ड, सर्ग ४९, श्लोक १७अर्थात: उस समय श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अहल्या के दोनों चरणोंका स्पर्श किया। महर्षिगौतम के वचनों का स्मरण करके अहल्या ने बड़ी सावधानी के साथ उन दोनों भाइयों को आदरणीय अतिथि के रूपमें अपनाया।अंत में मैं ये कहना चाहूंगा कि किसी को रामचरितमानस के प्रति कोई शंका नहीं होनी चाहिए। वह निःसंदेह हिन्दू धर्म के सबसे महानतम ग्रंथों में से एक है। वास्तव में तुलसीदास जी ने जिस काल में रामायण की रचना की उस समय पूरा देश और समाज मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों से दुखी था। इसी कारण उन्होंने रामचरितमानस को पूर्ण भक्ति रस में उस प्रकार लिखा ताकि समाज में श्रीराम के प्रति आस्था कम ना हो पाए। तो रामचरितमानस अपने युग में पूर्ण प्रासंगिक थी किन्तु हाँ, यदि सत्य जानना हो तो हमें वाल्मीकि रामायण पढ़ना ही चाहिए। आज की पीढ़ी के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वो हमारे मूल धर्मग्रंथों का अध्ययन करे अन्यथा इसी प्रकार भ्रमित होते रहेंगे। जय श्रीराम।

राष्ट्र हिंदू धर्म में क्या अहिल्या वास्तव में निर्दोष थी?

आपमें से कई लोग सोच रहे होंगे कि आज मैं ये कौन सा विषय लेकर आ गया। हम सभी ने हमेशा यही पढ़ा है कि पंचकन्याओं में से एक अहिल्या सर्वथा निर्दोष थी और महर्षि गौतम ने उन्हें बिना सत्य जाने श्राप दे दिया था। बाद में श्रीराम ने उनका उद्धार किया था। बरसों से हम यही सुनते और देखते आ रहे हैं। किन्तु आज हम इस घटना के सत्य को जानने का प्रयत्न करेंगे।

ऐसी शंकाएं लोगों के मन में केवल इसलिए आती हैं क्यूंकि उन्होंने कभी मूल ग्रन्थ पढ़ा ही नहीं होता। और जब मैं बोल रहा हूँ मूल ग्रन्थ, तो मैं वाल्मीकि रामायण की बात कर रहा हूँ, ना कि रामचरितमानस की। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के समाज में रामचरितमानस वाल्मीकि रामायण से बहुत अधिक प्रचलित है किन्तु मूल ग्रन्थ तो वाल्मीकि रामायण ही है।

अब चूँकि रामचरितमानस इतनी अधिक प्रचलित है, लोग उसी को पढ़ते हैं। यहाँ तक कि १९८७ में बनी रामानंद सागर का प्रसिद्ध सीरियल रामायण भी मुख्यतः रामचरितमानस पर ही आधारित था। अब जब लोग वही पढ़ते और देखते हैं जो हमारे सामने है, वे उस सत्य को नहीं जान पाते जो कि मूल ग्रन्थ में लिखा गया है। तो यदि आपको इस प्रश्न का वास्तविक उत्तर चाहिए तो आपको वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का ४८ वां सर्ग पढ़ना चाहिए।

अब जो मैं बताने जा रहा हूँ उसे बड़े ध्यान से सुनिए और एक बात का विशेष ध्यान रखिये कि मैं ये बातें मूल वाल्मीकि रामायण से बता रहा हूँ। इसीलिए यदि आपने रामचरितमानस या रामायण का कोई और संस्करण पढ़ा है या कोई टीवी सीरियल देखा हो तो उसे एक पल के लिए भूल जाइये। वैसे तो वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के ४८ वें सर्ग में कुल ३३ श्लोक हैं किन्तु मैं केवल दो श्लोकों का वर्णन करूँगा जिससे आपको बात समझ में आ जाएगी।

लोगों की ये आम धारणा है कि इंद्र गौतम ऋषि का वेश बना कर आये इसी कारण अहिल्या उन्हें पहचान नहीं पायी, जो कि बिलकुल गलत है। अहिल्या का जन्म स्वयं ब्रह्मदेव से हुआ था और उन्हें छला नहीं जा सकता था। वाल्मीकि रामायण में ये साफ लिखा है कि जब इंद्र गौतम ऋषि के वेश में आये और अहिल्या से प्रणय याचना की तब अहिल्या ने ये जान लिया था कि ये उनके पति नहीं हैं। किन्तु ये जान कर कि स्वयं देवराज इंद्र उनसे प्रणय याचना कर रहे हैं, अहिल्या ने सब कुछ जानते बुझते कौतुहल में उनकी बात मान ली। यह बात महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को बताते हैं।

मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।
मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक १९

अर्थात: ‘रघुनन्दन ! महर्षि गौतम का वेष धारण करके आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारी ने ‘अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं’ इस कौतूहल वश उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

यहाँ तक कि इंद्र से समागम के पश्चात अहिल्या इंद्र को धन्यवाद देते हुए कहती हैं कि अब आप शीघ्रता से यहाँ से चले जाइये और महर्षि गौतम के क्रोध से मेरी और स्वयं अपनी रक्षा कीजिये।
अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना।
कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमितः प्रभो॥
आत्मानं मां च देवेश सर्वथा रक्ष गौतमात्। 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २०

अर्थात: ‘रति के पश्चात् उसने देवराज इन्द्र से संतुष्टचित्त होकर कहा–’सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँ से चले जाइये। देवेश्वर! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी भी सब प्रकार से रक्षा कीजिये’।

इसके बाद की कथा हम जानते हैं कि जब इंद्र वापस जाने के लिए बाहर निकले तो महर्षि गौतम ने उन्हें देख लिया। ये देख कर महर्षि गौतम ने प्रथम दंड इंद्र को ही दिया। महर्षि गौतम ने इंद्र को नपुंसक हो जाने का श्राप दे दिया।

मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते।
अकर्तव्यमिदं यस्माद विफलस्त्वं भविष्यसि॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २७

अर्थात: “दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करने योग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल (अण्डकोषों से रहित) हो जायगा’।

गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना।
पेततुर्वृषणी भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात्॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २८

अर्थात: ‘रोष में भरे हुए महात्मा गौतम के ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्र के दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़े।

अब आते हैं अहिल्या के दंड पर। लोगों को ऐसा लगता है कि महर्षि गौतम ने उन्हें पत्थर बन जाने का श्राप दिया, पर ये भी गलत है। वास्तव में गौतम ऋषि ने अहिल्या को कई हजार वर्षों तक अदृश्य रूप में उसी आश्रम में प्रायश्चित करने का श्राप दिया।

तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान्।
इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि ॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक २९

वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।
अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक ३०

अर्थात: इन्द्र को इस प्रकार शाप देकर गौतम ने अपनी पत्नी को भी शाप दिया - 'दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इस आश्रम में निवास करेगी।'

यदा त्वेतद् वनं घोरं रामो दशरथात्मजः।
आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक ३१

तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता।।
मत्सकाशं मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि॥ 
बालकाण्ड, सर्ग ४८, श्लोक ३२

अर्थात: जब दुर्धर्ष दशरथ-कुमार राम इस घोर वन में पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करने से तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नतापूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी।’

लोग ऐसा भी सोचते हैं कि श्रीराम ने शिलरूपी अहिल्या के मस्तक पर अपने चरण रख कर उसका उद्धार किया था, जो बिलकुल गलत है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के ४९ वें सर्ग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम से कहते हैं कि 'हे राम! ये तपस्विनी सहस्त्रों वर्षों से तप करते हुए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है इसलिए तुम दोनों भाई जाकर इसके चरण छुओ।' तब श्रीराम और लक्ष्मण अहिल्या के चरण छूते हैं जिससे अहिल्या श्रापमुक्त होती है और तब महर्षि गौतम पुनः उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करते हैं।

राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा।
स्मरन्ती गौतमवचः प्रतिजग्राह सा हि तौ॥
बालकाण्ड, सर्ग ४९, श्लोक १७

अर्थात: उस समय श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अहल्या के दोनों चरणोंका स्पर्श किया। महर्षिगौतम के वचनों का स्मरण करके अहल्या ने बड़ी सावधानी के साथ उन दोनों भाइयों को आदरणीय अतिथि के रूपमें अपनाया।

अंत में मैं ये कहना चाहूंगा कि किसी को रामचरितमानस के प्रति कोई शंका नहीं होनी चाहिए। वह निःसंदेह हिन्दू धर्म के सबसे महानतम ग्रंथों में से एक है। वास्तव में तुलसीदास जी ने जिस काल में रामायण की रचना की उस समय पूरा देश और समाज मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों से दुखी था। इसी कारण उन्होंने रामचरितमानस को पूर्ण भक्ति रस में उस प्रकार लिखा ताकि समाज में श्रीराम के प्रति आस्था कम ना हो पाए। 

तो रामचरितमानस अपने युग में पूर्ण प्रासंगिक थी किन्तु हाँ, यदि सत्य जानना हो तो हमें वाल्मीकि रामायण पढ़ना ही चाहिए। आज की पीढ़ी के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वो हमारे मूल धर्मग्रंथों का अध्ययन करे अन्यथा इसी प्रकार भ्रमित होते रहेंगे। जय श्रीराम।

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"महाराज कर सुभ अभिषेका | सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका || सुर दुर्लभ सुख करि जग माही | अंतकाल रघुपति पुर जाही ||"* ( महाराज #श्रीरामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र 'निष्कामभाव से' सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं |समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब वे जगत में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में #श्रीरामजी के परमधाम को जाते हैं | )***

"महाराज कर सुभ अभिषेका |  सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ||  सुर दुर्लभ सुख करि जग माही |  अंतकाल रघुपति पुर जाही ||" By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब *      ( महाराज #श्रीरामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र 'निष्कामभाव से' सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं | वे जगत में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में #श्रीरामजी के परमधाम को जाते हैं | ) ***

आज गुरुवार है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेंगे, उसके बाद आपको कुछ काम की बातें बताऊंगी!!!!!#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती वनिता #कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️*बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥भावार्थ:-मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥अपने जीवन में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण जैसे कार्य सम्मलित किजियें, एक काम हम सबका है वह हैं -व्यक्ति निर्माण, हमें अपने आपके निर्माण की कसम खानी होगी, हम अपने स्वभाव को बदलें, हम अपने चिंतन को बदलें, हम अपने आचरण को बदलं।दूसरा परिवर्तन जो हमें करना है वो हमारे परिवार के सम्बन्ध में जो हमारी मान्यतायें हैं, जो आधार हैं, उनको बदलें, परिवार के व्यक्ति तो नहीं बदले जा सकते, हमारा अपने कुटुम्ब के प्रति जो रवैया है, जो हमारे सोचने का तरीका है,उसको हम आसानी से बदल सकते हैं।समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं, दायित्व हैं, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों से हम छुटकारा पा नहीं सकेंगे, समाज की उपेक्षा करते रहेंगे तो फिर समाज भी हमारी उपेक्षा करेगा और हमको कोई वजन नहीं मिलेगा, हम सम्मान नहीं पा सकेंगे, हम सहयोग नहीं पा सकेंगे, हमको समाज में सहयोग नहीं मिल सकेगा। न ही सम्मान मिल सकेगा।सम्मान और सहयोग ही मनुष्य की जीवात्मा की भूख और प्यास है, अगर हम उनको अपना बनाना चाहते हों तो कृपा करके यह विश्वास कीजिये कि जो समाज के प्रति हमारे दायित्व हैं, जो कर्तव्य हैं, वो हमें निभाने चाहिये, हम उन कर्तव्यों और दायित्वों को निभा लेंगे तो बदले में सम्मान और सहयोग पा लेंगे। जिससे हमारी खुशी, हमारी प्रशंसा और हमारी प्रगति में चार चाँद लग जायेंगे, दो काम हुयें, अपने आपका निर्माण करना, अपने परिवार का निर्माण करना, और तीसरा काम हैं अपने समाज को प्रगतिशील बनाने के लिये, उन्नतिशील बनाने के लिये कुछ न कुछ योगदान देना।तीन काम अगर हम कर पायें तो हमें समझना चाहिये कि हम आपने आत्मा की भूख को बुझाने के लिये और आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिये कुछ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया, अन्यथा ठीक है, हम अपने शरीर के लिये तो जिये ही हैं और शरीर के लिये तो मरना ही हैं। सज्जनों! अगर शरीर को ही हमने इष्ट देव समझा, इन्द्रियों के सुख को ही हमारी आकांक्षायें समझी और वासना और तृष्णा को ही हमने सब कुछ समझ लिया तो समझो हमने मानव जीवन लेकर भी कुछ नहीं किया, इनमें ही हमारा जीवन खर्च हो गया तो समझो हमारा जीवन व्यर्थ गया, जरा विचार किजियें, हमारा जीवन किस काम में खर्च हुआ? अब भी समय हैं सम्बल जाइयें, सादा जीवन-उच्च विचार के सिद्धान्तों का परिपालन कीजियें, सादगी, किफायतसारी, मितव्ययिता, अगर हमने ये अपना सिद्धान्त बना लिया तो विश्वास रखिये, हमारा बहुत कुछ काम हो जायेगा, बहुत समय बच जायेगा हमारे पास, और उन तीनों कर्तव्यों को पूरा करने के लिये हम समय और विचार भी निकाल सकेंगे। श्रम भी निकाल सकेंगे, पसीना भी निकाल सकेंगे, पैसा भी निकाल सकेंगे, और अगर आपने व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को जमीन-आसमान के तरीके से ऊँचा उठाकर के रखा होगा तो हमें अपना स्वयं का ही पूरा नहीं होगा, इसके लिये हमको अपनी कमाई से गुजारा नहीं हो सकता, फिर हमें बेईमानी करनी पड़ेगी, रिश्वत लेनी ही पडेगी, कम तोलना ही पड़ेगा, फिर दूसरों के साथ में दगाबाजी करनी ही पड़ेगी, फिर हमको कर्ज लेना भी पडेगा, मिलावट भी करनी पड़ेगी, जो भी हमें बुरे से बुरा कर्म भी करना पड सकता हैं।सज्जनों! अगर हम अपनी हविश को कम नहीं कर सकते और अपनी भौतिक खर्च की महत्त्वाकांक्षा को और बड़प्पन की महत्त्वाकांक्षा को काबू में नहीं कर सकते, फिर आत्मा की बात कहाँ चलती है? आत्मा की उन्नति की बात का सवाल कहाँ उठता है? भाई-बहनों! आत्मा को भी मान्यता दीजियें, शरीर ही सब कुछ नहीं है, शरीर की आकांक्षायें ही सब कुछ नहीं हैं, इन्द्रियाँ ही सब कुछ नहीं हैं, मन की लिप्सा और लालसा ही सब कुछ नहीं है। #Vnita❤️राधे राधे ❤️कहीं आत्मा भी हमारे भीतर है और आत्मा अगर हमारे भीतर है तो हमें ये भी विश्वास रखना होगा कि उसकी भी भूख और प्यास है, आत्मा के अनुदान भी असीम और असंख्य हैं, लेकिन उसकी भूख और प्यास भी है, पौधों के द्वारा, पेड़ों के द्वारा हरियाली भी मिलती है, छाया भी मिलती है, फल-फूल भी मिलते हैं, प्राणवायु भी मिलती है, पर उनकी जरूरत भी तो है न, हम जरूरत को क्यों भूल जाते हैं? खाद की जरूरत नहीं है? पानी की जरूरत नहीं है? रखवाली की जरूरत नहीं है?हम रखवाली नहीं करेंगे, खाद-पानी न देंगे तो पेड़ों से और पौधों से हम क्या आशा रखेंगे? इसी तरीके से जीवात्मा का पेड़ और वृक्ष तो है पर उसकी भी तो खुराक है, और खुराक क्या है? मैंने निवेदन किया है आपसे, व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के लिये हमारी गतिविधियाँ चलनी चाहिए और हमारे प्रयत्नों को अग्रगामी होना चाहियें, तभी जाकर हम, परिवार और समाज उन्नति कर सकते है।यह हमारी आध्यात्मिक सेवा है और इसी से हमें परमात्मा की प्राप्ति होगी, भाई-बहनों! आज गुरूवार के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् आप सभी को मंगलमय् हों, भगवान् श्री रामजी आप सभी की मनोकामनायें पूर्ण करें, आप सभी के जीवन में नैतिक मूल्यों और अध्यात्म की जागरूकता बढ़े, आप हमेशा आनन्दमय् जीवन जियें यहीं प्रभु से कामना।

आज गुरुवार है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेंगे, उसके बाद आपको कुछ काम की बातें बताऊंगी!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती वनिता #कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ भावार्थ:-मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥ अपने जीवन में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण जैसे कार्य सम्मलित किजियें, एक काम हम सबका है वह हैं -व्यक्ति निर्माण, हमें अपने आपके निर्माण की कसम खानी होगी, हम अपने स्वभाव को बदलें, हम अपने चिंतन को बदलें, हम अपने आचरण को बदलं। दूसरा परिवर्तन जो हमें करना है वो हमारे परिवार के सम्बन्ध में जो हमारी मान्यतायें हैं, जो आधार हैं, उनको बदलें, परिवार के व्यक्ति तो नहीं बदले जा सकते, हमारा अपने कुटुम्ब के प्रति जो रवैया है, जो हमारे सोचने का तरीका है,उसको हम आसानी से बदल सकते हैं। समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं, दायि...