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🔯 माता लक्ष्मी की कथा 🔯-----------------------------एक बूढ़ा ब्राह्मण था वह रोज पीपल को जल से सींचता था । पीपल में से रोज एक लड़की निकलती और कहती पिताजी मैं आपके साथ जाऊँगी। यह सुनते-सुनते बूढ़ा दिन ब दिन कमजोर होने लगा तो बुढ़िया ने पूछा की क्या बात है? बूढ़ा बोला कि पीपल से एक लड़की निकलती है और कहती है कि वह भी मेरे साथ चलेगी। बुढ़िया बोली कि कल ले आना उस लड़की को जहाँ छ: लड़कियाँ पहले से ही हमारे घर में है वहाँ सातवीं लड़की और सही।By वनिता कासनियां पंजाबअगले दिन बूढ़ा उस लड़की को घर ले आया। घर लाने के बाद बूढ़ा आटा माँगने गया तो उसे पहले दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा आटा मिला था। जब बुढ़िया वह आटा छानने लगी तो लड़की ने कहा कि लाओ माँ, मैं छान देती हूँ। जब वह आटा छानने बैठी तो परात भर गई। उसके बाद माँ खाना बनाने जाने लगी तो लड़की बोली कि आज रसोई में मैं जाऊँगी तो बुढ़िया बोली कि ना, तेरे हाथ जल जाएँगे लेकिन लड़की नहीं मानी और वह रसोई में खाना बनाने गई तो उसने तरह-तरह के छत्तीसों व्यंजन बना डाले और आज सभी ने भरपेट खाना खाया। इससे पहले वह आधा पेट भूखा ही रहते थे।रात हुई तो बुढ़िया का भाई आया और कहने लगा कि दीदी मैं तो खाना खाऊँगा। बुढ़िया परेशान हो गई कि अब खाना कहाँ से लाएगी। लड़की ने पूछा की माँ क्या बात है? उसने कहा कि तेरा मामा आया है और रोटी खाएगा लेकिन रोटी तो सबने खा ली है अब उसके लिए कहाँ से लाऊँगी। लड़की बोली कि मैं बना दूँगी और वह रसोई में गई और मामा के लिए छत्तीसों व्यंजन बना दिए। मामा ने भरपेट खाया और कहा भी कि ऎसा खाना इससे पहले उसने कभी नहीं खाया है। बुढ़िया ने कहा कि भाई तेरी पावनी भाँजी है उसी ने बनाया है। शाम हुई तो लड़की बोली कि माँ चौका लगा के चौके का दीया जला देना, कोठे में मैं सोऊँगी। बुढ़िया बोली कि ना बेटी तू डर जाएगी लेकिन वह बोली कि ना मैं ना डरुँगी, मैं अंदर कोठे में ही सोऊँगी। वह कोठे में ही जाकर सो गई। आधी रात को लड़की उठी और चारों ओर आँख मारी तो धन ही धन हो गया। वह बाहर जाने लगी तो एक बूढ़ा ब्राह्मण सो रहा था। उसने देखा तो कहा कि बेटी तू कहाँ चली? लड़की बोली कि मैं तो दरिद्रता दूर करने आई थी। उसने बूढे के घर में भी आँख से देखा तो चारों ओर धन ही धन हो गया।सुबह सवेरे सब उठे तो लड़की को ना पाकर उसे ढूंढने लगे कि पावनी बेटी कहां चली गई। बूढ़ा ब्राह्मण बोला कि वह तो लक्ष्मी माता थी जो हमारी दरिद्रता दूर करने आई थी । और हमारी दरिद्रता दूर करके चली गई । हे लक्ष्मी माता ! जैसे आपने उनकी दरिद्रता दूर की वैसे ही सबकी करना। 🌺🌼🙏🙏🚩🚩 ।।।।।।।।।।।।। 🌺JAY Mata Di 🌺 ।।।।।।।।।।।।। 🌻🌻🌷🌻🌻🌷🌻🌻🌷🌻🌻🌷🌻🌻

🔯 माता लक्ष्मी की कथा 🔯 ----------------------------- एक बूढ़ा ब्राह्मण था वह रोज पीपल को जल से सींचता था । पीपल में से रोज एक लड़की निकलती और कहती पिताजी मैं आपके साथ जाऊँगी। यह सुनते-सुनते बूढ़ा दिन ब दिन कमजोर होने लगा तो बुढ़िया ने पूछा की क्या बात है? बूढ़ा बोला कि पीपल से एक लड़की निकलती है और कहती है कि वह भी मेरे साथ चलेगी। बुढ़िया बोली कि कल ले आना उस लड़की को जहाँ छ: लड़कियाँ पहले से ही हमारे घर में है वहाँ सातवीं लड़की और सही। By वनिता कासनियां पंजाब अगले दिन बूढ़ा उस लड़की को घर ले आया। घर लाने के बाद बूढ़ा आटा माँगने गया तो उसे पहले दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा आटा मिला था। जब बुढ़िया वह आटा छानने लगी तो लड़की ने कहा कि लाओ माँ, मैं छान देती हूँ। जब वह आटा छानने बैठी तो परात भर गई। उसके बाद माँ खाना बनाने जाने लगी तो लड़की बोली कि आज रसोई में मैं जाऊँगी तो बुढ़िया बोली कि ना, तेरे हाथ जल जाएँगे लेकिन लड़की नहीं मानी और वह रसोई में खाना बनाने गई तो उसने तरह-तरह के छत्तीसों व्यंजन बना डाले और आज सभी ने भरपेट खाना खाया। इससे पहले वह आधा पेट भूखा ही रहते थे। रात हु...

भगवान विष्णु के बारे में कुछ दिमाग उड़ाने वाले तथ्य क्या हैं? बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम वनिता कासनियां पंजाब द्वाराविष्णु को देवताओं के देवता (देव-देव) के रूप में जाना जाता हैमहा करण विष्णु के रूप में, वह अपनी त्वचा के छिद्रों से अनंत ब्रह्मांडों का निर्माण करता है। वे ब्रह्मांड अपने बड़े ब्रह्मांडीय शरीर के अंदर परमाणुओं की तरह चलते हैं:गर्भ विष्णु के रूप में वह प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रवेश करता है और ब्रह्मा के रूप में जीवन बनाता है और भौतिक ब्रह्मांड के ऊपर सबसे अधिक निवास में मौजूद है जिसे वैकुंठ कहा जाता है:विष्णु को अनंत के रूप में संदर्भित किया जाता है जिसका अर्थ है अनंत। अनंतनाग के रूप में वह अपने एकलपन के तहत पूरे ब्रह्मांड का वजन वहन करते हैं जो उनके एकल आकार के मुकाबले सरसों के बीज के रूप में दिखाई देता है:यजुर्वेद विष्णु और शिव को एक ही इकाई के रूप में संदर्भित करता है। वे एक दूसरे से अलग नहीं हैं:विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए अवतार नरसिंह (आधा आदमी आधा शेर) के रूप में अवतार लिया:कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को अपना ब्राह्मण रूप दिखाया:विष्णु का अर्थ है, सर्वव्यापी। विष्णु से परे कुछ भी नहीं हैओम नमो नारायण

भगवान विष्णु के बारे में कुछ दिमाग उड़ाने वाले तथ्य क्या हैं? बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम वनिता कासनियां पंजाब द्वारा विष्णु को देवताओं के देवता (देव-देव) के रूप में जाना जाता है महा करण विष्णु के रूप में, वह अपनी त्वचा के छिद्रों से अनंत ब्रह्मांडों का निर्माण करता है। वे ब्रह्मांड अपने बड़े ब्रह्मांडीय शरीर के अंदर परमाणुओं की तरह चलते हैं: गर्भ विष्णु के रूप में वह प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रवेश करता है और ब्रह्मा के रूप में जीवन बनाता है और भौतिक ब्रह्मांड के ऊपर सबसे अधिक निवास में मौजूद है जिसे वैकुंठ कहा जाता है: विष्णु को अनंत के रूप में संदर्भित किया जाता है जिसका अर्थ है अनंत। अनंतनाग के रूप में वह अपने एकलपन के तहत पूरे ब्रह्मांड का वजन वहन करते हैं जो उनके एकल आकार के मुकाबले सरसों के बीज के रूप में दिखाई देता है: यजुर्वेद विष्णु और शिव को एक ही इकाई के रूप में संदर्भित करता है। वे एक दूसरे से अलग नहीं हैं: विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए अवतार नरसिंह (आधा आदमी आधा शेर) के रूप में अवतार लिया: कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को अपना ब्राह्मण रूप दिखाया: विष्णु का ...

#अखंड #सौभाग्य की कामना के लिए #हरतालिका तीज का #व्रत रखा जाता है। इस बार हरतालिका तीज का व्रत 30 अगस्त को रखा जा रहा है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। यह व्रत सुहागिन #महिलाएं सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती है। यह व्रत हरियाली तीज और कजरी तीज की तरह ही होता है। इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती है। इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन में सुख शांति बनी रहती है और रिश्ता मजबूत होता है। जानिए हरतालिका तीज की तिथि, शुभ #मुहूर्त और सामग्री के बारे में। By #वनिता #कासनियां #पंजाब ?हरतालिका तीज 2022 तिथि और शुभ मुहूर्त .भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि प्रारंभ- 29 अगस्त सोमवार को दोपहर 03 बजकर 20 मिनट से शुरू .#भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि समाप्त- 30 अगस्त मंगलवार को दोपहर 03 बजकर 33 मिनट तक .उदया तिथि के आधार पर हरतालिका तीज का व्रत 30 अगस्त को रखा जाएगा है।हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्तप्रात:काल हरतालिका पूजा मुहूर्त- सुबह 06 बजकर 12 मिनट से 08 बजकर 42 मिनट तकप्रदोष काल हरतालिका पूजन मुहूर्त = सुबह 6 बजकर 42 मिनट से दोपहर 03 बजकर 33 मिनट तकतृतीया तिथि का समय = 29 अगस्त को दोपहर 3 बजकर 21 से 30 अगस्त को दोपहर 03 बजकर 33 मिनट तक।हरतालिका तीज पूजन सामग्रीहरतालिका तीज पूजा के लिए सभी सामग्री पहले से ही एकत्र कर लें, जिससे कि पूजा के समय किसी समस्या का सामना न करना पड़ें। इसके लिए भगवान शिव, माता #पार्वती और भगवान गणेश की मूर्ति #मिट्टी से बनेगी। इसलिए #शुद्ध मिट्टी ले आएं। इसके अलावा पीला वस्त्र, केले का पत्ता, जनेऊ, सुपारी, रोली, बेलपत्र, धतूरा, शमी के पत्ते, दूर्वा, कलश, अक्षत, घी, कपूर, गंगाजल, दही #शहद और 16 #श्रृंगार का सामान सिंदूर, बिंदिया, मेंहदी, कुमकुम आदि ले आएं। इसके साथ ही शुद्ध घी, दीपक, धूप आदि ले आएं।#Vnita#Hartalika Teej's fast is kept to wish for #unbroken #good luck. This time the fast of Hartalika Teej is being observed on 30th August. According to the Panchang, Hartalika Teej is celebrated on the third day of Shukla Paksha of Bhadrapada month.

#अखंड #सौभाग्य की कामना के लिए #हरतालिका तीज का #व्रत रखा जाता है। इस बार हरतालिका तीज का व्रत 30 अगस्त को रखा जा रहा है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। यह व्रत सुहागिन #महिलाएं सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती है। यह व्रत हरियाली तीज और कजरी तीज की तरह ही होता है। इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती है। इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन में सुख शांति बनी रहती है और रिश्ता मजबूत होता है। जानिए हरतालिका तीज की तिथि, शुभ #मुहूर्त और सामग्री के बारे में। By #वनिता #कासनियां #पंजाब ? हरतालिका तीज 2022 तिथि और शुभ मुहूर्त . भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि प्रारंभ- 29 अगस्त सोमवार को दोपहर 03 बजकर 20 मिनट से शुरू . #भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि समाप्त- 30 अगस्त मंगलवार को दोपहर 03 बजकर 33 मिनट तक . उदया तिथि के आधार पर हरतालिका तीज का व्रत 30 अगस्त को रखा जाएगा है। हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त प्रात:काल हरतालिका पूजा मुहूर्त- सुबह 06 बजकर 12 मिनट से 0...

सच में गंगा स्नान से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं By Vnita kasnia Punjab गंगा स्नान हमारे सनातन धर्म में गंगा नदी को पवित्र नदी माना जाता है और आपने भी सुना होगा कि गंगा स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । परन्तु क्या यह सच है या केवल एक भ्रम?आइए मिलकर जानते हैं आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है । नमस्कार मित्रों getgyaan पर आपका स्वागत है । हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार की बात है भगवान शिव और माता पार्वती गंगा किनारे घूम रहे थे । उसी समय माता पार्वती ने देखा कि हजारों श्रद्धालु गंगा स्नान के बाद भगवान शिव का नाम लेते हुए बाहर निकल रहे हैं ।लोगों को ऐसा करते देख माता पार्वती तो पहले हैरान हो गई । फिर कुछ देर बाद उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि हे स्वामी! वैसे तो गंगा के जल को पापनाशनी कहा जाता है फिर भी मुझे इन लोगों को देखकर ऐसा क्यों लग रहा है कि इनमें से अधिकतर लोगों को अपने पापों से मुक्ति नहीं मिली है ।क्या गंगा पहले की तरह पवित्र नहीं रही? माता पार्वती के मुख से ऐसी बातें सुनकर भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले हे देवी आपको ऐसा क्यों लग रहा है? देवी गंगा तो पहले की तरह ही पवित्र और निर्मल है । आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अभी आपने जिन लोगों को गंगा स्नान कर बाहर निकलते हुए देखा, वास्तव में उन लोगों ने तो गंगा में स्नान किया ही नहीं ।क्या डुबकी लगाना ही गंगा स्नान है?तब देवी पार्वती पुनः भगवान शिव से बोली हे देवाधिदेव, लेकिन यह कैसे संभव हो सकता है कि आप देख नहीं पा रहे कि अभी भी कुछ लोग गंगा स्नान और डुबकी लगाने में रत है और जो लोग बाहर निकल आए हैं उनके कपड़े भी भीगे हुए है ।यह सुनकर भगवान शिव माता पार्वती के सवाल का जवाब देते हुए बोले है प्रिया ये सभी जल में डुबकी लगाकर निकल रहे हैं । कोई भी गंगा के पवित्र जल में स्नान नहीं कर रहा परंतु मेरी इस बात का रहस्य आप आज नहीं समझ पाएगी ।कल फिर आप मेरे साथ ही आना । तब मेरी सारी बात आपको समझ में आ जाएगी । इतना कहकर भगवान शिव माता पार्वती को अपने साथ साथ लेकर वहाँ से कैलाश को चले गए । अगले दिन माता पार्वती और भगवान शिव के पृथ्वी लोग पर आने से पहले बारिश शुरू हो गई थी । बारिश के कारण पृथ्वी लोग पर कीचड ही कीचड दिखाई दे रहा था ।क्या गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं?यह देख भगवान शिव पहले तो मंद मंद मुस्कुराने लगे और फिर कुछ छण बाद एक लाचार वृद्ध मनुष्य का वेश धारण कर गंगा किनारे पहुँच गए और एक गड्ढे में जाकर सो गए । फिर जब लोगों की भीड इकट्ठी हुई तो वो गड्ढे से निकलने की असफल कोशिश करने लगे । माता पार्वती जो एक वृद्ध महिला के रूप में उस गड्ढे के ऊपर खड़ी थी वो जोर जोर से आवाज लगाने लगी । कोई है जो मेरे वृद्ध एवं असहाय पति को गड्ढे से बाहर निकाल सके । कोई पुण्यात्मा रहम करो और गड्ढे से निकालकर मेरे पति के प्राण बचाओ परंतु जो भी मेरे पति को बाहर निकालने के लिए आएगा उसे मुझे विश्वास दिलाना होगा कि उसने अपने जीवन में कोई पाप ना किया हो नहीं तो वो हाथ लगाते ही जलकर भस्म हो जाएगा ।माता पार्वती की ये बातें गंगा स्नान कर रहे उस रास्ते से निकलने वाले सभी लोग सुनते लेकिन वृद्ध महिला की बातें सुनकर सभी के मन में अपने पापों का ख्याल आ जाता और फिर आगे बढ़ जाते हैं । इतना ही नहीं कई लोग लोकलज्जा और धर्म के डर से भी उस महिला के पास नहीं गए । कई लोगों ने महिला रूपी माता पार्वती से यहाँ तक कहा की तुम इस बुड्ढे को मरने के लिए छोड़ क्यों नहीं देती । इसी तरह कई लोग आए और माता पार्वती की बातें सुनकर वहाँ से चले गए । इसी तरह पूरा दिन बीत गया और शाम हो चली ।एक आदमी जिसे विश्वास था गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैंतब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा देखा प्रिया गंगा में नहाने वाला कोई भी मुझे बचाने नहीं आया । उसी समय एक युवक हाथ में जलपात्र लिए हर हर महादेव करते हुए वहाँ से निकला । उस युवक को देख माता पार्वती ने उसे भी वही बात बताई और मदद मांगी । वृद्ध महिला रूपी माता पार्वती की बात सुनकर युवक का हृदय करूणा से भराया और उसने शिवजी रूप उस वृद्ध व्यक्ति को गड्ढे से बाहर निकालने की तैयारी की ।यह देख माता पार्वती उसे रोकते हुए कहने लगी कि यदि तुमने कोई पाप ना किया हो तो ही मेरे पति को हाथ लगाना अन्यथा जलकर भस्म हो जाओगे । यह सुन उस युवक ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पार्वती जी से कहा कि माता मेरे निष्पाप होने में कोई संदेह नहीं है? देखती नहीं । मैं अभी गंगा नहा कर आया हूँ । भला गंगा में गोता लगाने के बाद भी कोई पापी रहता है क्या । इतना कहकर उसने वृद्ध रूप में गड्ढे में पडे शिव जी को बाहर निकाल लिया ।क्या है वास्तविक गंगा स्नान?यह देख भगवान शिव और माता पार्वती उस युवक पर प्रसन्न हो गए और दोनों ही अपने असली रूप में आ गए और युवक को आशीर्वाद देकर वहाँ से अपने निवास अर्थात कैलाश को लौट गए । तब रास्ते में शिव जी ने माता पार्वती से कहा देखा प्रिया, इतने लोगों में उस युवक ने ही पवित्र गंगा में स्नान किया और बाकी लोग तो गंगा में स्नान करके केवल अपने शरीर को धो रहे थे ।तो मित्रो आप समझ ही गए होंगे कि बिना श्रद्धा और विश्वास के केवल दंभ के लिए गंगा स्नान करने से पाप नहीं धुलते बल्कि इसके लिए आपको अपने मन को श्रद्धावान भी करना आवश्यक होता है । परन्तु इसका मतलब नहीं कि गंगा स्नान व्यर्थ जाता है । इसलिए जिन लोगों के मन में है विश्वास ही नहीं है कि गंगा स्नान से उनके मन के पाप कम हो जाएँगे ।इसी के साथ विदा लेते हैं पोस्ट पसंद आयी हो तो इसे शेयर जरूर करें । पोस्ट की जानकारी के लिए व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करें। ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Whatsapp । धन्यवाद !

सच में गंगा स्नान से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं  By  Vnita kasnia Punjab गंगा स्नान  हमारे सनातन धर्म में गंगा नदी को पवित्र नदी माना जाता है और आपने भी सुना होगा कि गंगा स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । परन्तु क्या यह सच है या केवल एक भ्रम? आइए मिलकर जानते हैं आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है । नमस्कार मित्रों getgyaan पर आपका स्वागत है । हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार की बात है भगवान शिव और माता पार्वती गंगा किनारे घूम रहे थे । उसी समय माता पार्वती ने देखा कि हजारों श्रद्धालु गंगा स्नान के बाद भगवान शिव का नाम लेते हुए बाहर निकल रहे हैं । लोगों को ऐसा करते देख माता पार्वती तो पहले हैरान हो गई । फिर कुछ देर बाद उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि हे स्वामी! वैसे तो गंगा के जल को पापनाशनी कहा जाता है फिर भी मुझे इन लोगों को देखकर ऐसा क्यों लग रहा है कि इनमें से अधिकतर लोगों को अपने पापों से मुक्ति नहीं मिली है । क्या गंगा पहले की तरह पवित्र नहीं रही? माता पार्वती के मुख से ऐसी बातें सुनकर भगवान शिव मुस्कुराते हुए बोले हे देवी आपको ऐसा क्यों लग...

एकादशी व्रत को सभी व्रतों का राजा क्यों कहते हैं ? By वनिता कासनियां पंजाब:: भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय है एकादशी का व्रत । पूर्व काल में मुर दैत्य को मारने के लिए भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई जो विष्णु के तेज से सम्पन्न और युद्धकला में निपुण थी । उसकी हुंकार मात्र से मुर दैत्य राख का ढेर हो गया । वह कन्या ही एकादशी देवी थी । इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उससे वर मांगने को कहा । एकादशी देवी ने वर मांगा—‘यदि आप प्रसन्न हैं तो आपकी कृपा से मैं सब तीर्थों में प्रधान, सभी विघ्नों का नाश करने वाली व समस्त सिद्धि देने वाली देवी होऊं । जो लोग उपवास (नक्त और एकभुक्त) करके मेरे व्रत का पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म व मोक्ष प्रदान कीजिए ।’भगवान ने वर देते हुए कहा—‘ऐसा ही हो । जो तुम्हारे भक्तजन हैं वे मेरे भी भक्त कहलायेंगे ।’एकादशी व्रत को सभी ‘व्रतों का राजा’ या ‘व्रतों में शिरोमणि’ क्यों कहते हैं ?वैकुण्ठधाम की प्राप्ति कराने वाला, भोग और मोक्ष दोनों ही देने वाला तथा पापों का नाश करने वाला एकादशी के समान कोई व्रत नहीं है, इसलिए इसे ‘व्रतों का राजा’ कहते हैं । सभी व्रत व सभी दान से अधिक फल एकादशी व्रत करने से होता है ।जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, प्रकाश-तत्त्वों में सूर्य, नदियों में गंगा प्रमुख हैं वैसे ही व्रतों में सर्वश्रेष्ठ व्रत एकादशी-व्रत को माना गया है । इस तिथि को जो कुछ दान किया जाता है, भजन-पूजन किया जाता है, वह सब भगवान श्रीहरि के पूजित होने पर पूर्णता को प्राप्त होता है । संसार के स्वामी सर्वेश्वर श्रीहरि पूजित होने पर संतुष्ट होकर प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं । इस दिन किया गया प्रत्येक पुण्य कर्म अनन्त फल देता है और मनुष्य के सात जन्मों के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप दूर हो जाते हैं ।▪️विभिन्न नक्षत्रों का योग होने पर एकादशी-व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है । जैसे——जब शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पुनर्वसु’ नक्षत्र हो तो वह तिथि ‘जया’कहलाती है । इसका व्रत करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।——जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘श्रवण’ नक्षत्र हो तो वह तिथि ‘विजया’कहलाती है । इसमें किया गया व्रत, दान व ब्राह्मण-भोजन सहस्त्र गुना फल देने वाला होता है ।——जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘रोहिणी’ नक्षत्र हो तो वह तिथि ‘जयन्ती’कहलाती है । इस दिन भगवान गोविन्द का व्रत व पूजन करने से वे मनुष्य के सब पाप धो डालते हैं ।—जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘पुष्य’ नक्षत्र हो तो वह तिथि ‘पापनाशिनी’कहलाती है । इसका व्रत करने से संसार के स्वामी प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं । पुष्प नक्षत्र से युक्त एकादशी का व्रत करने से मनुष्य एक हजार एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त कर लेता है । इस दिन किए गये स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय व देव पूजा का अक्षय फल माना गया है ।गोदान व अश्वमेध-यज्ञ करने का जो फल होता है, उससे सौगुना अधिक फल एकादशी व्रत करने वाले को मिलता हैएकादशी व्रत के करने से सभी रोग व दोष शान्त हो जाते हैं ।मनुष्य को दीर्घायु, सुख-शान्ति व समृद्धि की प्राप्ति होती है ।मनुष्य जीवन का उद्देश्य ‘भगवान की प्राप्ति’ भी एकादशी व्रत से हो जाती है ।चिन्तामणि के समान एकादशी व्रत मनुष्य की सभी कामनाएं पूरी करता हैं । एकादशी व्रत का अखण्ड पालन करने से मनुष्य की सौ पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है ।एकादशी का व्रत सभी पुण्यों को और मोक्ष देने वाला है ।एकादशी के दिन अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए ?एकादशी के दिन अन्न (गेहूं, चावल आदि) खाने से पाप क्यों लगता है, इसके लिए कहा गया है कि—‘ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप एकादशी के दिन अन्न में रहते हैं । अत: एकादशी के दिन जो भोजन करता है, वह पाप-भोजन करता है ।’ यदि एकादशी का व्रत न भी कर सकें तो इस दिन चावल और उससे बने पदार्थ नहीं खाने चाहिए ।एकादशी का व्रत क्यों करना चाहिए ?▪️यह संसार भोग-भूमि और मानव योनि भोग-योनि है इसलिए मनुष्य की स्वाभाविक रुचि भोगों की ओर ही रहती है । मनुष्य यदि भोगों में ही लिप्त रहेगा तो वह इस संसार में आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकेगा । संसार में सब कार्यों को करते हुए भी कम-से-कम पक्ष में एक बार मनुष्य भोगों से अलग रहकर ‘स्व’ में स्थित रहे और अपने मन व चित्त को सात्विक रखकर भगवान की प्राप्ति की ओर मुड़ सके इसके लिए एकादशी व्रत का विधान किया गया है ।▪️एकादशी ‘नित्य व्रत’ है इसलिए नित्य-कर्म की तरह सभी वैष्णवों को इस व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए । ▪️ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चन्द्रमा की एकादश (ग्यारह) कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है । चन्द्रमा का प्रभाव शरीर और मन पर होता है, इसलिए इस तिथि में शरीर की अस्वस्थता और मन की चंचलता बढ़ जाती है । इसी तरह कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सूर्य की एकादश कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है । इसी कारण उपवास से शरीर को संभालने और इष्टदेव के पूजन से चित्त की चंचलता दूर करने और मानसिक बल बढ़ाने के लिए एकादशी का व्रत करने का नियम बनाया गया है ।▪️एकादशी व्रत करने से वात आदि कितनी ही तरह की व्याधियों से मनुष्य की रक्षा होती है ।▪️यदि उदयकाल में थोड़ी-सी एकादशी, मध्य में पूरी द्वादशी और अंत में थोड़ी-सी भी त्रयोदशी हो तो वह ‘त्रिस्पृशा’ एकादशी कहलाती है । यह भगवान को बहुत ही प्रिय है । इसका उपवास करने से एक सहस्त्र एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होता है ।▪️दशमी युक्त एकादशी का व्रत कभी नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से संतान का नाश होता है और सद्गति (विष्णुलोक की प्राप्ति) नहीं होती है ।

एकादशी व्रत को सभी व्रतों का राजा क्यों कहते हैं ? By वनिता कासनियां पंजाब:: भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय है एकादशी का व्रत । पूर्व काल में मुर दैत्य को मारने के लिए भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई जो विष्णु के तेज से सम्पन्न और युद्धकला में निपुण थी । उसकी हुंकार मात्र से मुर दैत्य राख का ढेर हो गया । वह कन्या ही एकादशी देवी थी । इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उससे वर मांगने को कहा ।  एकादशी देवी ने वर मांगा—‘यदि आप प्रसन्न हैं तो आपकी कृपा से मैं सब तीर्थों में प्रधान, सभी विघ्नों का नाश करने वाली व समस्त सिद्धि देने वाली देवी होऊं । जो लोग उपवास (नक्त और एकभुक्त) करके मेरे व्रत का पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म व मोक्ष प्रदान कीजिए ।’ भगवान ने वर देते हुए कहा—‘ऐसा ही हो । जो तुम्हारे भक्तजन हैं वे मेरे भी भक्त कहलायेंगे ।’ एकादशी व्रत को सभी ‘व्रतों का राजा’ या ‘व्रतों में शिरोमणि’ क्यों कहते हैं ? वैकुण्ठधाम की प्राप्ति कराने वाला, भोग और मोक्ष दोनों ही देने वाला तथा पापों का नाश करने वाला एकादशी के समान कोई व्रत नहीं है, इसलिए इसे ‘व्रतों का राजा’ कहत...

आज गुरुवार है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेंगे, उसके बाद आपको कुछ काम की बातें बताऊंगी!!!!!#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती वनिता #कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️*बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥भावार्थ:-मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥अपने जीवन में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण जैसे कार्य सम्मलित किजियें, एक काम हम सबका है वह हैं -व्यक्ति निर्माण, हमें अपने आपके निर्माण की कसम खानी होगी, हम अपने स्वभाव को बदलें, हम अपने चिंतन को बदलें, हम अपने आचरण को बदलं।दूसरा परिवर्तन जो हमें करना है वो हमारे परिवार के सम्बन्ध में जो हमारी मान्यतायें हैं, जो आधार हैं, उनको बदलें, परिवार के व्यक्ति तो नहीं बदले जा सकते, हमारा अपने कुटुम्ब के प्रति जो रवैया है, जो हमारे सोचने का तरीका है,उसको हम आसानी से बदल सकते हैं।समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं, दायित्व हैं, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों से हम छुटकारा पा नहीं सकेंगे, समाज की उपेक्षा करते रहेंगे तो फिर समाज भी हमारी उपेक्षा करेगा और हमको कोई वजन नहीं मिलेगा, हम सम्मान नहीं पा सकेंगे, हम सहयोग नहीं पा सकेंगे, हमको समाज में सहयोग नहीं मिल सकेगा। न ही सम्मान मिल सकेगा।सम्मान और सहयोग ही मनुष्य की जीवात्मा की भूख और प्यास है, अगर हम उनको अपना बनाना चाहते हों तो कृपा करके यह विश्वास कीजिये कि जो समाज के प्रति हमारे दायित्व हैं, जो कर्तव्य हैं, वो हमें निभाने चाहिये, हम उन कर्तव्यों और दायित्वों को निभा लेंगे तो बदले में सम्मान और सहयोग पा लेंगे। जिससे हमारी खुशी, हमारी प्रशंसा और हमारी प्रगति में चार चाँद लग जायेंगे, दो काम हुयें, अपने आपका निर्माण करना, अपने परिवार का निर्माण करना, और तीसरा काम हैं अपने समाज को प्रगतिशील बनाने के लिये, उन्नतिशील बनाने के लिये कुछ न कुछ योगदान देना।तीन काम अगर हम कर पायें तो हमें समझना चाहिये कि हम आपने आत्मा की भूख को बुझाने के लिये और आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिये कुछ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया, अन्यथा ठीक है, हम अपने शरीर के लिये तो जिये ही हैं और शरीर के लिये तो मरना ही हैं। सज्जनों! अगर शरीर को ही हमने इष्ट देव समझा, इन्द्रियों के सुख को ही हमारी आकांक्षायें समझी और वासना और तृष्णा को ही हमने सब कुछ समझ लिया तो समझो हमने मानव जीवन लेकर भी कुछ नहीं किया, इनमें ही हमारा जीवन खर्च हो गया तो समझो हमारा जीवन व्यर्थ गया, जरा विचार किजियें, हमारा जीवन किस काम में खर्च हुआ? अब भी समय हैं सम्बल जाइयें, सादा जीवन-उच्च विचार के सिद्धान्तों का परिपालन कीजियें, सादगी, किफायतसारी, मितव्ययिता, अगर हमने ये अपना सिद्धान्त बना लिया तो विश्वास रखिये, हमारा बहुत कुछ काम हो जायेगा, बहुत समय बच जायेगा हमारे पास, और उन तीनों कर्तव्यों को पूरा करने के लिये हम समय और विचार भी निकाल सकेंगे। श्रम भी निकाल सकेंगे, पसीना भी निकाल सकेंगे, पैसा भी निकाल सकेंगे, और अगर आपने व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को जमीन-आसमान के तरीके से ऊँचा उठाकर के रखा होगा तो हमें अपना स्वयं का ही पूरा नहीं होगा, इसके लिये हमको अपनी कमाई से गुजारा नहीं हो सकता, फिर हमें बेईमानी करनी पड़ेगी, रिश्वत लेनी ही पडेगी, कम तोलना ही पड़ेगा, फिर दूसरों के साथ में दगाबाजी करनी ही पड़ेगी, फिर हमको कर्ज लेना भी पडेगा, मिलावट भी करनी पड़ेगी, जो भी हमें बुरे से बुरा कर्म भी करना पड सकता हैं।सज्जनों! अगर हम अपनी हविश को कम नहीं कर सकते और अपनी भौतिक खर्च की महत्त्वाकांक्षा को और बड़प्पन की महत्त्वाकांक्षा को काबू में नहीं कर सकते, फिर आत्मा की बात कहाँ चलती है? आत्मा की उन्नति की बात का सवाल कहाँ उठता है? भाई-बहनों! आत्मा को भी मान्यता दीजियें, शरीर ही सब कुछ नहीं है, शरीर की आकांक्षायें ही सब कुछ नहीं हैं, इन्द्रियाँ ही सब कुछ नहीं हैं, मन की लिप्सा और लालसा ही सब कुछ नहीं है। #Vnita❤️राधे राधे ❤️कहीं आत्मा भी हमारे भीतर है और आत्मा अगर हमारे भीतर है तो हमें ये भी विश्वास रखना होगा कि उसकी भी भूख और प्यास है, आत्मा के अनुदान भी असीम और असंख्य हैं, लेकिन उसकी भूख और प्यास भी है, पौधों के द्वारा, पेड़ों के द्वारा हरियाली भी मिलती है, छाया भी मिलती है, फल-फूल भी मिलते हैं, प्राणवायु भी मिलती है, पर उनकी जरूरत भी तो है न, हम जरूरत को क्यों भूल जाते हैं? खाद की जरूरत नहीं है? पानी की जरूरत नहीं है? रखवाली की जरूरत नहीं है?हम रखवाली नहीं करेंगे, खाद-पानी न देंगे तो पेड़ों से और पौधों से हम क्या आशा रखेंगे? इसी तरीके से जीवात्मा का पेड़ और वृक्ष तो है पर उसकी भी तो खुराक है, और खुराक क्या है? मैंने निवेदन किया है आपसे, व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के लिये हमारी गतिविधियाँ चलनी चाहिए और हमारे प्रयत्नों को अग्रगामी होना चाहियें, तभी जाकर हम, परिवार और समाज उन्नति कर सकते है।यह हमारी आध्यात्मिक सेवा है और इसी से हमें परमात्मा की प्राप्ति होगी, भाई-बहनों! आज गुरूवार के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् आप सभी को मंगलमय् हों, भगवान् श्री रामजी आप सभी की मनोकामनायें पूर्ण करें, आप सभी के जीवन में नैतिक मूल्यों और अध्यात्म की जागरूकता बढ़े, आप हमेशा आनन्दमय् जीवन जियें यहीं प्रभु से कामना।

आज गुरुवार है, पहले गुरुमहाराज जी की वंदना करेंगे, उसके बाद आपको कुछ काम की बातें बताऊंगी!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती वनिता #कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ भावार्थ:-मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥ अपने जीवन में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण जैसे कार्य सम्मलित किजियें, एक काम हम सबका है वह हैं -व्यक्ति निर्माण, हमें अपने आपके निर्माण की कसम खानी होगी, हम अपने स्वभाव को बदलें, हम अपने चिंतन को बदलें, हम अपने आचरण को बदलं। दूसरा परिवर्तन जो हमें करना है वो हमारे परिवार के सम्बन्ध में जो हमारी मान्यतायें हैं, जो आधार हैं, उनको बदलें, परिवार के व्यक्ति तो नहीं बदले जा सकते, हमारा अपने कुटुम्ब के प्रति जो रवैया है, जो हमारे सोचने का तरीका है,उसको हम आसानी से बदल सकते हैं। समाज के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं, दायि...

दुर्गा माँ के अनेक रूप में से एक माँ शैलपुत्री के बारे में आप क्या बता सकते हैं?बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम संगरिया राजस्थान की अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाबनेहा जी प्रश्न के लिए धन्यवाद।आइए देखते हैं देवी माँ का शैलपुत्री नाम कहाँ किस संदर्भ में आया है।दुर्गा सप्तशती के पाठ के आरम्भ में पाठ की सिद्धि सफलता के लिए★ कवच ★कीलक और ★अर्गलाइन तीन का पाठ करने पर जोर दिया गया है।इनमें से प्रथम देव्या कवचम के पाठ से साधक का सम्पूर्ण शरीर सभी प्रकार की बाधाओं से सुरक्षित हो जाता है।इसमें ५६ श्लोक हैं।देवी चण्डिका को नमस्कार के उपरांत इन श्लोकों में से आरंभ के तीसरे चौथे और पांचवें श्लोक में जगदंबिका के नौ नाम दिए हैं:प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी ।तृतीयं चंद्र घण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम।।पञ्चमं स्कन्द मातेति षष्टम कात्यायनीति च।सप्तम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम ।।नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गा: प्रकीर्तिताः।उपरोक्त नौ नामों में प्रथम नाम शैलपुत्री है। इसका अर्थ हुआ गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती।यह हिमालय की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री रूप में प्रकट हुईं। इसकी पुराण व्याख्या से इतर अन्य तांत्रिक व्याख्याएं भी हैं।विभिन्न पुराणों में इसका आख्यान है। इसी प्रकार अन्य नामों की भी व्याख्या है।_______________________________★शैलपुत्री पार्वती शिव की अर्धांगिनी हैं , शिव शक्ति के इस संयुक्त स्वरूप की शाक्त शैव दर्शनों में कई तरह से व्याख्या है।★यह शैलपुत्री पार्वती ही आदिशक्ति हैं जिनके विविध नाम रूप हैं। सृजन पालन संहार करने वाली शक्ति हैं,महा सरस्वती महालक्ष्मी महाकाली हैं, सर्व व्यापी चेतना हैं।________________________________दुर्गा सतशती के पंचम अध्य्याय में कहा गया है कि जब देवता , शुम्भ निशुम्भ राक्षसों से पराजित होकर गिरिराज हिमालय पर गए और वहाँ भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे:"नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम।।"उस समय देवी पार्वती गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहाँ आईं और देवों से पूँछा कि आप किसकी स्तुति कर रहे हैं? तब पार्वती जी के शरीरकोश से प्रकट हुई शिवा देवी बोलीं, यह मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।◆पार्वती के शरीर से अम्बिका के प्रादुर्भाव से पार्वती का शरीर काले रंग का हो गया अतः वे हिमालय पर रहने वाली कालिका देवी के नाम से विख्यात हुईं।(दुर्गा सप्तशती पञ्चम अध्याय श्लोक ८८ )●देवी माँ के इन नौ नाम के बाद दुर्गा सप्तशती के अगले अर्गला पाठ में ग्यारह नाम वर्णित हैं :●१-जयन्ती २-मंगला ३-काली ४-भद्रकाली ५-कपालिनी ६-दुर्गा ७-क्षमा ८-शिवा ९-धात्री १०-स्वाहा ११-स्वधा .●दुर्गा सप्तशती में परिशिष्ट में दुर्गा के बत्तीस नाम भी दिए गए हैं।मेरे विचार से विगत कुछ दशकों से देवी माँ के कवच में वर्णित नाम मीडिया में कुछ अधिक ही चर्चित हो गए हैं जबकि जिस देवी कवच में ये नाम आरम्भ में आए हैं उस कवच का कोई उल्लेख मीडिया में नहीं देखा जाता है।●इन नौ नामों के चित्र भी गीता प्रेस गोरखपुर ने उपलब्ध कराए हैं इसलिए भी इन नौ नामों का मीडिया में चलन बढ़ा है।●जबकि नव रात्रि की देवी साधना में अथवा नित्य ही दुर्गा सप्तशती के समस्त या कुछ अध्यायों का जो पाठ करते हैं उनमें इन नौ नामों का अलग से उल्लेख नहीं किया जाता।कोई देवी साधक शरीर रक्षा के लिए नित्य कवच का पाठ करते हैं उनकी उपासना में ये नौ नाम पाठ आरम्भ में स्वतः ही आ जाते हैं। इन नौ नामों में कुछ के पुराण आख्यान भी हैं ।वस्तुतः साकार सगुण रूप आसानी से मन को ग्रहण होता है इसलिए त्रिदेव, गणेश, देवी माँ के सगुण रूप ही अधिक प्रचलित हैं।★★पार्वती कुंडलिनी शक्ति के रूप में:जब कुंडलिनी शक्ति का वर्णन किया जाता है तब इस शक्ति को छह चक्रों में से प्रथम मूलाधार चक्र में स्थित माना जाता है। रोचक तथ्य यह है कि इस मूलाधार चक्र के रक्षक पार्वती पुत्र गणेश जी हैं।◆इस षड़चक्र के आधार प्रथम चक्र में ही शक्ति का वास है और इसकी कृपा के लिए सर्वप्रथम गणेश उपासना आवश्यक है।गणपति अथर्व शीर्ष में भी रक्तवर्ण गणेश को मूलाधार में स्थित कहा गया है:त्वम मूलाधार स्थितोsसि नित्यं,त्वम शक्ति त्रयात्मकः त्वाम योगिनो ध्यायन्ति नित्यमयही बात इस कथा के रूप में प्रतीक रूप से वर्णित की गई है कि पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से पुतला बना कर उसमें चेतना संचार कर द्वार रक्षा में नियुक्त किया ।शक्ति से चेतन इसी पुतले को बाद में गणेश कहा गया।★तंत्र की दृष्टि से देवी माँ को दस महाविद्याओं के रूप में वर्णित किया गया है : १ काली, २ तारा, ३ श्रीविद्या या त्रिपुर सुंदरी या ललिता, ४ भुवनेश्वरी, ५ त्रिपुर भैरवी,६ धूमावती, ७ छिन्नमस्ता, ८बगला, ९ मातंगी , १० कमला।देश के विभिन्न भागों में उपरोक्त दस महाविद्याओं में से प्रत्येक के सिद्ध मन्दिर भी हैं।इतना ही क्यों सारे भारत में देवी के 52 सिद्ध पीठ भी हैं । चित्र देखिए जो गूगल के सौजन्य से आगे प्रस्तुत है।★★इनमें से हिंगलाज पीठ व एक अन्य पीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में है जिसकी सेवा आज भी हिन्दू मुसलमान मिलकर करते हैं ।जबकि सुगंधा व एक अन्य बंगला देश में है।दुर्गा चालीसा में भी "हिंगलाज में तुमही भवानी" ऐसा उल्लेख है ।मेरी माताजी जब यह पढ़ती थीं तो समझ नहीं आता था कि इसका क्या अर्थ है।हिंगलाजदेवी मन्दिर।चित्र इण्डिया टाइम्स के सौजन्य सेजरा विचार कीजिए कि विभिन्न भूगोल भाषा व स्थानीय संस्कृति की विविधता के बाद भी इन 52 शक्तिपीठों ने हजारों वर्षों से भारत को कितने मजबूत सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधे रखा है। भले ही राजनीतिक दृष्टि से उन क्षेत्रों में अलग अलग राज्य वंशों का शासन रहा।पर अब आज के सिक्कूलर उधार बुद्धिवादी सनातन धर्म के इस एकता मूलक प्रभाव के प्रति एलर्जिक हैं।अभी देवी माँ के सगुण रूप की चर्चा की ।जबकि वेद की दृष्टि से विचार करें तो देवी माँ को मूल प्रकृति और ब्रह्म स्वरूपणी ही कहा गया है। देखिए अथर्व वेद का देवी अथर्व शीर्षम जिसमें देवों के यह प्रश्न करने पर कि देवी आप कौन हैं तो देवी ने कहा:मैं ब्रह्म स्वरूपणी हूँ। मैं ही प्रकृति और पुरुषरूपात्मक जगत हूँ। ….अहम अखिलं जगत। मैं ही रुद्र और वसु हूँ.. विष्णु ब्रह्म देव और प्रजापति को धारण करती हूँ…यह सगुण निर्गुण निरूपण बहुत ही मनोरम है।इसका सदैव अर्थ समझते हुए अध्ययन मनन करते रहना चाहिए।● प्रश्न के उत्तर का सार यानिष्कर्ष:●शैल पुत्री यह नाम देवी माँ के नौ नामों में से एक प्रथम नाम है जो शैलजा पार्वती को संबोधित है। यह देवी कवच में आया है तथा इसका पुराण में कथाआख्यान भी है।●शैल पुत्री पार्वती ही आदिशक्ति रूप हैं और शिव की अर्द्धांगिनी हैं। ●शैल पुत्री पार्वती ही महा सरस्वती महा लक्ष्मी और महाकाली हैं। शैलपुत्री पार्वती ही दश महाविद्या हैं,सृजन पालन संहारशक्ति हैं और चेतना रूप से सवर्त्र व्याप्त हैं।या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।: षड़चक्र चित्र, देश के शक्ति पीठ स्थल चित्र गूगल से, शैलपुत्री गीता प्रेस की पुस्तक से, हिंगलाज india times से साभार।

दुर्गा माँ के अनेक रूप में से एक माँ शैलपुत्री के बारे में आप क्या बता सकते हैं? बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम संगरिया राजस्थान की अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाब नेहा जी प्रश्न के लिए धन्यवाद। आइए देखते हैं देवी माँ का शैलपुत्री नाम कहाँ किस संदर्भ में आया है। दुर्गा सप्तशती के पाठ के आरम्भ में पाठ की सिद्धि सफलता के लिए ★  कवच ★कीलक और ★अर्गला इन तीन का पाठ करने पर जोर दिया गया है। इनमें से प्रथम  देव्या कवचम  के पाठ से साधक का सम्पूर्ण शरीर सभी प्रकार की बाधाओं से सुरक्षित हो जाता है।इसमें ५६ श्लोक हैं। देवी चण्डिका को नमस्कार के उपरांत इन श्लोकों में से आरंभ के तीसरे चौथे और पांचवें श्लोक में जगदंबिका के नौ नाम दिए हैं: प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी ।तृतीयं चंद्र घण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम।। पञ्चमं स्कन्द मातेति षष्टम कात्यायनीति च। सप्तम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम ।। नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गा: प्रकीर्तिताः। उपरोक्त नौ नामों में प्रथम नाम शैलपुत्री है। इसका अर्थ हुआ गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती। यह हिमालय की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत...